क्यों मेहनत नहीं करना चाहते हैं युवा मुसलमान, बड़े मुस्लिम विद्वान का चौंकाने वाला खुलासा

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भारत में ज्यादातर मुस्लिम युवा पढ़ाई के लिए मेहनत नहीं करना चाहते हैं। वह बॉलीवुड में जाना चाहते हैं। देश में ज्यादातर फर्जी मदरसों को ही सरकारी अनुदान मिल रहा है। यह चौंकाने वाला खुलासा 10 साल तक अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़े आयोग के चेयरमैन रहे जस्टिस एमएसए सिद्दीकी (रिटायर्ड) ने किया है। उन्होंने देश में मुसलमानों के बीच शिक्षा को लेकर नजरिए और मदरसों के नाम पर फैले भ्रष्टाचार की जो पोल खोली है, वह हिला देने वाली है। उनका दावा है कि यह मोदी-योगी सरकार के आने के बाद भी बंद नहीं हुआ है। उन्होंने यह भी बताया है कि मुस्लिम लड़कियां पढ़ाई को लेकर ज्यादा गंभीर हैं, लेकिन लड़कों का तो नजरिया ही अलग है।

एक इंटरव्यू में नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन के पूर्व चेयरमैन जस्टिस एमएसए सिद्दीकी ने देश में मुसलमानों के बीच शिक्षा की दयनीय हालत पर बहुत बड़ी जानकारी दी है। उन्होंने केंद्र सरकार से यहां तक मांग की है कि ‘फर्जी मदरसों’ को अनुदान देना बंद करे। उनके मुताबिक इन अनुदानों का बेजा इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने मांग की है कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि जनता के पैसे बोगस कार्यों पर नहीं खर्च किए जाएं। अल्पसंख्यक शिक्षा की स्थिति पर उनकी जानकारी को लेकर इसलिए सवाल नहीं उठाए जा सकते, क्योंकि यूपीए सरकार के दौरान 2004 से लेकर 2014 तक वह इसके चीफ रहे हैं।

भारत में मदरसा शिक्षा की मौजूदा चुनौतियों के बारे में उन्होंने कहा है कि इसमें भ्रष्टाचार और दलाली का बोलबाला है। जस्टिस सिद्दीकी ने कहा है कि अपने कार्यकाल में उन्होंने सरकार को इसकी जानकारी भी दी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। उनका कहना है कि आज भी यह स्थिति बदली नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘भ्रष्टाचार को खत्म करने का एक ही तरीका है कि फर्जी मदरसों को अनुदान देना बंद कर दिया जाए।’ उन्होंने इस भ्रष्टाचार के बारे बताया कि हर जिले में सरकार जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों के माध्यम से अनुदानों का वितरण करती है। आमतौर पर इन अफसरों की फर्जी मदरसों से साठगांठ रहती है, जिसे मौलवी सिर्फ कागज पर चलाते हैं। अधिकारी उन्हें अनुदान दिलाता है और बदले में उसे मोटा कमीशन मिलता है।

मेरठ की एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे वहां फर्जी मदरसों पर रिपोर्ट करने गए मीडिया वालों को असामाजिक तत्वों ने दौड़ा दिया था। बाद में जांच कराने पर पता चला कि करीब 4,000 मदरसे सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं, लेकिन सरकार उन्हें समय पर पैसे देती है। उन्होंने गोंडा की एक घटना का जो जिक्र किया है, वह इस व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। उनका दावा है कि गोंडा में एक पंडित जी एक प्राइमरी स्कूल चलाते थे, लेकिन उन्हें जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी से मदरसा वाला अनुदान मिल रहा था।

जस्टिस सिद्दीकी ने कहा है कि ‘मुस्लिम युवाओं के साथ दिक्कत ये है कि वे शाहरुख खान और सलमान खान की तरह बॉलीवुड अभिनेता बनना चाहते हैं, लेकिन आईएएस अधिकारी बनने के लिए कड़ी मेहनत नहीं करना चाहते हैं।’ उनका मानना है कि मुसलमानों के लड़कों और लड़कियों दोनों के लिए अच्छी शिक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है। लेकिन, उनका मानना है कि मुसलमानों की लड़कियां शिक्षा को लेकर ज्यादा संजीदा हैं। उन्होंने कहा है, ‘मुझे लगता है कि मुस्लिम समुदाय में लड़कों की तुलना में लड़कियां शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देती हैं।

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