धर्म, गरीबी या अशिक्षा? भारत में मुस्लिमों की आबादी बढ़ने की असली वजह क्या है, जानिए

Facebook
X
WhatsApp

क्या भारत में मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ रही है? देश में गूगल से सबसे ज्यादा पूछे जाने वाले सवालों में यह भी शामिल है। लोगों में भारतीय मुस्लिमों के जन्म दर को लेकर काफी उत्सुकता पाई जाती है। सच भी है कि दशकों से मुसलमानों का जन्म दर बाकी सबसे ज्यादा है। ताजा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में पता चला है कि प्रत्येक मुस्लिम महिला अपने जीवन में औसतन 2.36 बच्चों को जन्म देती है जो 1.99 के राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। वहीं, हिंदुओं की बात की जाए तो इसका जन्म दर 1.94 के साथ राष्ट्रीय औसत से नीचे है। हालांकि, आंकड़ों पर गौर करेंगे तो पता चलता है कि मुसलमानों में औसत जन्म दर का ऊंचा होना सिर्फ और सिर्फ धर्म का मसला नहीं है बल्कि इसके पीछे और भी कई कारण हैं- मसलन, गरीबी और अशिक्षा। यही कारण है कि मुस्लिम तबका भी शिक्षा और समृद्धि के पैमाने पर ज्यों-ज्यों देश के दूसरे धर्मों से कदमताल मिला रहा है त्यों-त्यों उनमें भी जन्म दर तेजी से घट रहा है।

परिवार के आकार पर शिक्षा का असर
25% मुस्लिम महिलाएं कभी स्कूल नहीं गईं जबकि सिर्फ 20% मुस्लिम महिलाओं ने ही 12वीं पास की। शिक्षा के मामले में इतना पिछड़ापन भारत में किसी और धर्म के लोगों के बीच नहीं है।

उत्तर प्रदेश की हिंदू महिलाओं का जन्म दर 2.29 है जबकि तमिलनाडु की मुस्लिम महिलाओं का जन्म दर 1.93 है। चूंकि तमिलनाडु में उत्तर प्रदेश के मुकाबले सभी धर्मों का जन्म दर कम है, इससे पता चलता है कि जन्म दर पर सामाजिक वातावरण का भी असर होता है।
इन बाधाओं के बावजूद मुस्लिम जन्म दर बाकी सभी धर्मों के मुकाबले सबसे तेजी से घट रहा है। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच शिक्षा और समृद्धि का फासला भी कम हो रहा है। 1992 में किए गए पहले राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में मुस्लिम जन्म दर 4.41 था जबकि हिंदू जन्म दर 3.3 यानी दोनों के बीच 1 पॉइंट का बड़ा अंतर। 30 साल बाद अब यह अंतर घटकर आधे से भी कम पॉइंट का रह गया है।

मुस्लिम महिलाएं भी छोटे परिवारों को तरजीह देती हैं
⮞ यूपी में मुस्लिम जन्म दर अभी 2.66 है लेकिन वहां की मुसलमान महिलाएं 1.88 से ज्यादा जन्म दर नहीं चाहती हैं। इच्छित जन्म दर और वास्तविक जन्म दर में सबसे बड़ा अंतर बिहार (1.13), हरियाणा (1.02) और यूपी (0.78) में है।
⮞ इसका कारण संभवतः यह है कि सिर्फ 47.4% मुस्लिम महिलाओं को ही गर्भनिरोधक हाथ लग पाते हैं।
⮞ 4.4% बिना बच्चे वाली विवाहित मुस्लिम महिलाएं जबकि 38.3% मुस्लिम पुरुष बच्चा चाहते ही नहीं है जबकि 5.6% ऐसी हिंदू महिलाएं और 4.01% हिंदू पुरुष भी बच्चा नहीं चाहते।

जन्म दर पर धर्म का असर भी होता है
यह कहना बिल्कुल उचित नहीं होगा कि जन्म दर का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। मेघालय में इसाई महिलाएं, मुस्लिम महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बच्चे पैदा करती हैं। यह राज्य ज्यादा जन्म दर के मामले में बिहार के बाद देश में दूसरे नंबर पर है। चूंकि इसाइयों में शिक्षा और समृद्धि मुसलमानों के मुकाबले कहीं ज्यादा है, फिर भी मुसलमानों से ज्यादा बच्चे पैदा करने के पीछे गर्भनिरोधकों के प्रति चर्च और पादरियों की शिक्षा एवं धार्मिक विश्वास का असर ही समझा जा सकता है।

The specified slider does not exist.

ताजा खबरें