Mount Everest Glacier Melting: दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर हर साल चढ़ाई के लिए पहुंचने वाले हजारों लोगों की गतिविधियां अब खुम्बू ग्लेशियर (Khumbu Glacier) के लिए चिंता का कारण बनती जा रही हैं। नेपाल और अमेरिका के वैज्ञानिकों की एक रिसर्च में सामने आया है कि पर्वतारोहियों के पेशाब से निकलने वाली गर्मी भी ग्लेशियर की बर्फ पिघलाने में योगदान दे रही है। (Mount Everest Glacier Melting) हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी साफ किया है कि पेशाब से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा एवरेस्ट बेस कैंप (Everest Base Camp) में बड़े पैमाने पर होने वाली ईंधन की खपत से पैदा होने वाली गर्मी है।
शोध में इंसानी गतिविधियों और खुम्बू ग्लेशियर के पिघलने के बीच संबंध को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर बेस कैंप में पैदा होने वाली गर्मी और दूसरी मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित नहीं किया गया, तो भविष्य में पर्यावरण और आपदा से जुड़े खतरे और बढ़ सकते हैं।
Mount Everest Glacier Melting: हर साल ग्लेशियर के ऊपर बस जाता है पूरा बेस कैंप
माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के सीजन में एवरेस्ट बेस कैंप सीधे खुम्बू ग्लेशियर के ऊपर बसाया जाता है। हर साल यहां करीब 1,600 टेंट लगाए जाते हैं। यह सिर्फ साधारण कैंप नहीं होता, बल्कि इन टेंटों में पर्वतारोहियों और वहां मौजूद लोगों के लिए कई तरह की सुविधाएं तैयार की जाती हैं।
बेस कैंप में किचन, शॉवर, जनरेटर और वाई-फाई जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद होती हैं। (Mount Everest Glacier Melting) कुछ जगहों पर फर्श को गर्म रखने की व्यवस्था भी की जाती है। इन सभी सुविधाओं को चलाने के दौरान पैदा होने वाली गर्मी जमीन के तापमान को बढ़ाती है और इसका सीधा असर ग्लेशियर की बर्फ पर पड़ता है।
नेपाल और अमेरिका के वैज्ञानिकों के एक समूह ने जर्नल रीजनल एनवायरनमेंटल चेंज (Regional Environmental Change) में प्रकाशित अपने अध्ययन में बताया कि इंसानी गतिविधियां ग्लेशियर के पिघलने में भूमिका निभा रही हैं। शोधकर्ताओं ने इसे भविष्य में सामने आने वाली गंभीर आपदा की आशंका से भी जोड़ा है।
6,766 लीटर पेशाब पहुंचा बेस कैंप से जुड़े सिस्टम में
शोध में बताया गया कि ज्यादा ऊंचाई पर पर्वतारोहियों को सामान्य से अधिक पानी पीना पड़ता है। (Mount Everest Glacier Melting) इसका सीधा असर शरीर से निकलने वाले पेशाब की मात्रा पर पड़ता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, साल 2023 के चढ़ाई वाले सीजन में एवरेस्ट बेस कैंप पर हर दिन करीब 6,766 लीटर पेशाब पैदा हुआ।
खिम लाल गौतम और उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन में पाया कि इंसानी पेशाब अपने साथ गर्मी भी लेकर आता है। यही गर्मी ग्लेशियर की बर्फ पिघलाने में योगदान देती है। शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक, उस सीजन में केवल इंसानी पेशाब से पैदा होने वाली गर्मी के कारण करीब 154 टन बर्फ पिघली।
37 डिग्री से ठंडा होने लगता है पेशाब
हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया कि पेशाब को ग्लेशियर के पिघलने का सबसे बड़ा कारण नहीं माना जा सकता। इंसानी शरीर से करीब 37 डिग्री सेल्सियस तापमान पर बाहर निकलने के बाद पेशाब तेजी से ठंडा होने लगता है।
इस दौरान उसमें मौजूद गर्मी का केवल एक छोटा हिस्सा ही बर्फ तक पहुंच पाता है। बाकी गर्मी हवा या आसपास मौजूद चट्टानों में चली जाती है। इसके बावजूद, बड़ी संख्या में पर्वतारोहियों और लंबे समय तक चलने वाले चढ़ाई के सीजन को देखते हुए यह गर्मी भी ग्लेशियर के पिघलने में अपना योगदान दे रही है।
असली बड़ा खतरा है बेस कैंप में जलने वाला ईंधन
रिसर्च के मुताबिक, खुम्बू ग्लेशियर के लिए इंसानी पेशाब से कहीं ज्यादा बड़ी समस्या बेस कैंप में इस्तेमाल होने वाला ईंधन है। खाना पकाने, गर्मी पैदा करने और बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में ईंधन का इस्तेमाल किया जाता है।
साल 2023 के चढ़ाई वाले सीजन में बेस कैंप में 824 एलपीजी सिलेंडर इस्तेमाल किए गए। इसके अलावा 18,935 लीटर केरोसिन और 5,130 लीटर गैसोलीन का भी इस्तेमाल हुआ।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, ईंधन के इस्तेमाल से पैदा होने वाली गर्मी इंसानों की गतिविधियों के कारण होने वाले ग्लेशियर पिघलाव के करीब 94 फीसदी हिस्से के लिए जिम्मेदार थी। इसके मुकाबले पेशाब से पैदा होने वाली गर्मी का योगदान करीब 6 फीसदी रहा।
बेस कैंप का तापमान तेजी से बढ़ने की चेतावनी
वैज्ञानिकों ने हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान को लेकर भी चेतावनी दी है। उनके मुताबिक, हिमालय के कुछ इलाके तेजी से गर्म हो रहे हैं और इसका असर वहां मौजूद ग्लेशियरों पर साफ दिखाई दे रहा है।
साइंस एडवांसेस (Science Advances) में साल 2019 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, साल 2000 के बाद बर्फ का नुकसान उससे पहले की अवधि की तुलना में करीब दोगुना हो गया।
नई रिसर्च करने वाली टीम के मुताबिक, एवरेस्ट बेस कैंप की सतह का तापमान खुम्बू ग्लेशियर के दूसरे हिस्सों की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। यहां तापमान करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है, जो वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
क्या अब बेस कैंप को दूसरी जगह शिफ्ट किया जाए?
इस खतरे को देखते हुए शोधकर्ताओं ने यह भी अध्ययन किया कि क्या एवरेस्ट बेस कैंप को उसकी मौजूदा जगह से हटाया जाना चाहिए। टीम ने मौजूदा बेस कैंप के दक्षिण-पश्चिम में दो संभावित जगहों की पहचान की, जहां भविष्य में कैंप को स्थानांतरित करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, बेस कैंप को दूसरी जगह ले जाना आसान नहीं होगा। ऐसा करने में कई लॉजिस्टिक समस्याएं सामने आ सकती हैं। साथ ही वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी कि नई जगह पर कैंप बसाने से वहां भी पर्यावरणीय नुकसान हो सकता है और नए तरह के आपदा संबंधी खतरे पैदा हो सकते हैं।
सौर ऊर्जा और बेहतर कचरा प्रबंधन पर जोर
शोधकर्ताओं ने खुम्बू ग्लेशियर को बचाने के लिए बेहतर कचरा प्रबंधन और सौर ऊर्जा (Solar Energy) पर ज्यादा निर्भरता बढ़ाने की जरूरत बताई है। उनका मानना है कि बेस कैंप के कुछ हिस्से को दूसरी जगह ले जाने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है।
लेकिन केवल कैंप को शिफ्ट कर देना ही इस समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक, सबसे जरूरी बात यह है कि इंसानी गतिविधियों से पैदा होने वाली गर्मी को नियंत्रित किया जाए। माउंट एवरेस्ट पर हर साल बढ़ती गतिविधियों के बीच यह रिसर्च एक नई चेतावनी की तरह सामने आई है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी तक पहुंचने की इंसानी कोशिशें अनजाने में उसके आसपास मौजूद नाजुक पर्यावरण और खुम्बू ग्लेशियर पर भी असर डाल रही हैं।









