वैलेंटाइन डे पर हिंडालको लेखा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी प्रदीप मिश्रा के द्वारा कुछ खास पंक्तियां

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ए खुशी तू कहां खो गई
मुझे जगाके चैनसे तू सो गई
तुझे धुंडा गली, मोहल्ला चौराहे पे
मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा पे
कभी घुमता रहा शॉपिंग मॉल
धुंडा जाके तुझे सिनेमा हॉल
हर जगाह मिली तू बस पल दो पली
फिर ना जाने कहां चुप गई
ए खुशी तू कहां खो गई
ए खुशी तू कहां खो गई

सोचा कुछ बनजाऊ तो तू मिल जाएगी
नया ले लू कुछ भी तो तू खिल जाएगी
जितना तेरे पास जाने की कोषिश किया
ओत्ना ही तुझे मैं दूर पाया
ऐसी मुझसे क्या खाता हो गई
ए खुशी तू कहां खो गई
ए खुशी तू कहां खो गई

खुशी दरी सहमी हुई बैठ के रो रही थी
जैसे की मानो कुछ कहना चाह रही थी
मैं पुछा ऐ खुशी तुम क्यों रो रही हो
तुम भी क्या कुछ पा ने की चाह रही हो
खुशी बोली तुम मुझे खुद से कर दिए हो दूर
मैं जब भी गई पास तुम चल दिए कहीं और
मैं तो अंदर ही रहती हूं हमीसा तुम्हारा
बी बजाह क्यों धुंडते हो बाहर बनके बंजारा

जब हर पल खुश रहना सिख जाओगे
तुम्हारे पास मुझे सदा पाओगे
छोड दो दोसरो से प्रतियोगिता करना
खो दो गे मुझे हमीसा के लिए बरना
सोच में रखो सदा सचाई
नेगेटिविटी मैं भी देखो अच्छाई
अभी मुरझा गई हैं तबी फिर से खिल जाऊंगी
हमीसा के लिए तुझे मैं मिल जाउंगी
हमीसा के लिए तुझे मैं मिल जाउंगी

प्रदीप कुमार मिश्रा

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