ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर सिर्फ ओवैसी ने संभाल रखा है मोर्चा, आखिर विपक्ष में इतना सन्नाटा क्यों है?

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लखनऊ: वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे 6 मई 2022 को कोर्ट के आदेश पर शुरू हुआ। मुस्लिम पक्ष के विरोध के बीच सर्वे चला। 17 मई को ज्ञानवापी मसले पर दायर याचिका की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसकी सुनवाई वाराणसी जिला अदालत में ही होगी, तब तक ज्ञानवापी में नमाज न रुके साथ ही हिंदू पक्ष ने जिन साक्ष्‍यों का जिक्र किया है उनकी सुरक्षा भी हो। लेकिन 6 मई से 17 मई के बीच प्रियंका, अखिलेश यादव और मायावती की ओर से ज्ञानवापी मसले पर कोई बयान नहीं आया।

यह जरूर है कि कांग्रेस, बीएसपी और सपा ने जिस दल को बीजेपी की बी पार्टी के तौर पर मशहूर किया उसी AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इनकी चुप्‍पी पर सवाल खड़े किए। असदुद्दीन ओवैसी ने वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियो सर्वेक्षण पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) सहित सभी विपक्षी दलों की ‘चुप्पी’ पर आरोप लगाया कि ये दल इसलिए चुप हैं, क्योंकि मुसलमान उनके वोट बैंक नहीं हैं।

ओवैसी ने अहमदाबाद में ईद के बाद आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, ‘कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे विपक्षी दल ज्ञानवापी मस्जिद के मुद्दे पर चुप क्यों हैं? वे कुछ नहीं कह रहे हैं, क्योंकि मुसलमान उनके वोट बैंक नहीं हैं।’
इतना ही नहीं बीजेपी, कांग्रेस, आप और समाजवादी पार्टी को ‘कट्टरपंथी दल’ करार देते हुए ओवैसी ने आरोप लगाया कि ये दल चाहते हैं कि मुसलमान घर पर ही मुसलमान रहें और बाहर होने पर उनकी (दलों की) संस्कृति को स्वीकार करें।

एक समय में मुस्लिम वोटर थे सत्‍ता की चाबी
आजादी के बाद लंबे समय तक मुसलमान कांग्रेस का पारंपरिक वोटर बना रहा। लेकिन धीरे-धीरे मुस्लिम समाज और कांग्रेस के बीच दूरी बढ़ती गई। यूपी में समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम वोटरों के साथ खड़े होने की कोशिश की। अयोध्‍या की बाबरी मस्जिद में कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश देने के बाद तत्‍कालीन सीएम और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की छवि मुसलमानों के बीच पुख्‍ता हो गई। सपा कांग्रेस का विकल्‍प बन गई। दलित राजनीति का झंडा लेकर चलने वाली बीएसपी भी दलित-मुस्लिम गठजोड़ के बल पर 2007 में सत्ता में आई और मायावती यूपी की सीएम बनीं।

लेकिन अबतक ज्ञानवापी के मसले पर इन तीनों ही दलों ने खुलकर कुछ नहीं बोला है। अखिलेश जरूर कुछ बयान देते रहे लेकिन सीधे कहने से बचते रहे। उन्‍होंने इसे बीजेपी का ऐसा स्‍टंट बताया जिससे जनता का ध्‍यान महंगाई जैसी समस्‍याओं से दूर खींचा जा सके। इसके बावजूद, ज्ञानवापी मसले पर उनका और उनकी पार्टी का क्‍या स्‍टैंड है यह उन्‍होंने साफ नहीं किया।

कांग्रेस के चिंतन शिविर में भी चर्चा नहीं
इसी दौरान राजस्‍थान में कांग्रेस का चिंतन शिव‍िर भी आयोजित हुआ लेकिन वहां भी प्रियंका, राहुल ज्ञानवापी पर कुछ नहीं बोले। पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने मीडिया के सवाल पर इतना भर कहा कि किसी भी पूजा स्थल की स्थिति को बदलने का कोई प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। अगर किसी धार्मिक स्थल की स्थिति बदलने की कोशिश की जाती है तो इससे बहुत बड़ा विवाद पैदा हो जाएगा। मायावती ने तो खैर इस पर कुछ कहा ही नहीं।

कुल मिलाकर हाल के यूपी चुनाव ने मुसलमान वोटरों और गैर बीजेपी राजनीतिक दलों के बीच कुछ चीजें साफ कर दीं। चुनाव नतीजों ने बता दिया कि अब दोनों को ही एक दूसरे पर भरोसा नहीं रहा। वर्तमान में चल रहे ज्ञानवापी विवाद में कांग्रेस, सपा, बीएसपी की चुप्‍पी से समझा जा सकता है कि ये दल जान गए हैं कि मुस्लिम वोट पहले की तरह सत्‍ता तक पहुंचने की गारंटी नहीं है। यही वजह है कि विपक्ष में इतना सन्नाटा छाया है क्‍योंकि ऐसे में जब खुद मुसलमानों को उन पर भरोसा नहीं रह गया वे हिंदू वोटरों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेंगे।

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