World Tobacco Day 2022 : सिगरट के बड से पैदा हुआ बड़ा खतरा, देश-विदेश के शोध में सामने आए चौकाने वाले तथ्य

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तंबाकू और तंबाकू जनित पदार्थों का सेवन हमारी सेहत के लिए हानिकारक है। इसके सेवन से दिल-दिमाग से लेकर मनोरोग जैसी गंभीर बीमारियां होती ही हैं, यह विभिन्न प्रकार के कैंसर की वजह भी बनता है। सिगरेट के जरिये तंबाकू का सेवन और भी घातक है। देश-विदेश में हुए विभिन्न शोधों में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। सिगरेट पीकर जहां-तहां फेंके जने वाले फिल्टर या बड सिर्फ स्वास्थ्य के ही नहीं, बल्कि पर्यावरण की सेहत के लिए भी खतरा बन रहे हैं।
देश की बड़ी आबादी पान मसाले और सिगरेट का सेवन करती है, जो पान मसाले के पाउच, सिगरेट की पैकिंग और उसके बड जहां-तहां फेंक देते हैं। नतीजतन, इसका कचरा धीरे-धीरे एकत्र हो रहा है, यह बायो डिग्रेबल नहीं यानी कभी नष्ट नहीं होता है। इसके सूक्ष्म कण मिट्टी और पानी में घुलकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

सेल्युलोज एसीटेट फाइबर एक प्रकार के माइक्रो प्लास्टिक होते हैं, जिनका इस्तेमाल सिगरेट के बड में होता है, जो अति सूक्ष्म कण (नैनो पार्टिकल) होते हैं। लंबे समय तक मिट्टी में घुले रहकर उसकी जैविक संरचना में बदलाव करने लगते हैं। मिट्टी के मिनरल व पानी के जरिये पेड़-पौधों में पहुंचते हैं।
वहीं, पानी से नदी-समुद्र तक पहुंच कर मछलियों और जलीय जीव-जंतु को भी प्रभावित करते हैं। इसी तरह पानी जब वाष्प से बादल बन बरसता है तो हर क्षेत्र में फैल जाते हैं। इस तरह यह हमारे फूड चेन (खाद्य श्रृंखला) में भी चले जाते हैं।

भूमि की उर्वरा क्षमता को करते प्रभावित : सेल्युलोज एसीटेट फाइबर माइक्रो प्लास्टिक हैं। जो दिखाई नहीं पड़ते हैं और न ही कभी खत्म होते हैं। लंबे समय तक मिट्टी में मौजूद रहने की वजह से उसके रासायनिक तत्व मिट्टी की उर्वरक क्षमता को खत्म करते जाते हैं। ऐसे में बीजों का अंकुरण, पेड़-पौधों का विकास रुक जाता है। मिट्टी धीरे-धीरे बंजर होने लगती है। इसलिए अपघटन अवस्था में रासायनिक प्रभाव विशेष रूप से समस्याग्रस्त होते हैं।

-जब प्लास्टिक के कण टूटते हैं, तो वे नए भौतिक और रासायनिक गुण प्राप्त कर लेते हैं, जिससे जोखिम और बढ़ने से जीवों पर विषाक्त प्रभाव अधिक पड़ता है। प्रभावित प्रजातियों और पारिस्थितिक कार्यों की संख्या जितनी अधिक होगी, विषाक्त प्रभाव होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। इस तरह से खून से होते हुए बोन मैरो में पहुंच जाते हैं। ब्लड कैंसर, लंग्स कैंसर, खाने की नली और गाल ब्लाडर के कैंसर की वजह बनते हैं। यही वजह है कि इस तरह की कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। -डा. जीतेंद्र वर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर, जेके कैंसर संस्थान।

बड में इस्तेमाल होने वाला रूई जैसा लगने वाला पदार्थ माइक्रोप्लास्टिक हाेता है, जिनमें सेल्युलोज एसीटेट फाइबर होते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होते हैं। माइक्रो बीड्स ठोस प्लास्टिक कण होते हैं जो आमतौर पर 10 माइक्रोमीटर (0.00039 इंच) से लेकर 1 मिलीमीटर (0.039 इंच) तक होते हैं।

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