Dara Singh Chauhan: घोसी उपचुनाव में ‘बाहरी बनाम बाहुबली’ पर वोटिंग, दारा सिंह चौहान की साख दांव पर

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Dara Singh Chauhan: पूरे उत्तर प्रदेश का सियासी तापमान बढ़ाने वाली घोसी विधानसभा सीट ने सबकी धड़कनें भी बढ़ा रखी हैं. उपचुनाव को लेकर यहां के वोटिंग ट्रेंड पर सबकी नज़र है. घोसी कहने को तो पिछड़ी बिरादरी के नेताओं और वोटर्स की विधानसभा सीट है, लेकिन जो ट्रेंड यहां देखने को मिलता है, उसे समझना किसी के लिए भी आसान नहीं है.

घोसी विधानसभा की बात करें तो यहां 4 लाख 30 हज़ार से ज़्यादा वोटर हैं.(Dara Singh Chauhan) पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और मुस्लिम आबादी ही यहां की राजनीतिक कfस्मत तय करती है. फिर चाहे वो घोसी लोकसभा सीट हो या विधानसभा, दोनों चुनाव में इन्हीं बिरादरी के मतदाताओं का समीकरण सबसे निर्णायक भूमिका निभाता है. चौहान, राजभर और सवर्ण तीनों वर्ग के नेताओं को घोसी की जनता अपना नेता चुन चुकी है.

इस बार के उपचुनाव में समीकरण काफी पेचीदा

2012 के विधानसभा चुनाव में घोसी विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर जीतकर बाहुबली सुधाकर सिंह विजयी हुए थे. एक बार फिर वो घोसी से सपा के टिकट पर ही मैदान में हैं. पारंपरिक तौर पर फागू चौहान सबसे ज़्यादा 6 बार चुनाव जीत चुके हैं. लेकिन, इस बार के उपचुनाव में समीकरण काफी पेचीदा नज़र आ रहा है. इस बार का वोटिंग ट्रेंड कुछ अलग तरह की तस्वीर पेश कर सकता है.

बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे पर ज़ोर

घोसी विधानसभा सीट पर उपचुनाव का ऐलान होते ही, एक मुद्दा शुरू से ही चर्चा में रहा. सपा समेत स्थानीय लोगों ने बाहरी बनाम स्थानीय को लेकर खूब प्रचार किया. घोसी के लोगों का कहना है कि यहां के लोगों के नसीब में ज़्यादातर बाहरी नेता ही आता है. फागू चौहान को यहां के लोगों ने BSP और BJP दोनों के बैनर पर चुनकर भेजा. वहीं, दारा सिंह चौहान को सपा के बैनर पर अपना नेता चुना. हालांकि, वो घोसी के बराबर वाली विधानसभा सीट मधुबन से 2017 में BJP के टिकट पर विधायक चुने गए थे.

बहरहाल, फागू और दारा दोनों आज़मगढ़ के रहने वाले हैं. 6 बार फागू चौहान और एक बार दारा चौहान को मिलाकर कुल 7 चुनाव में घोसी के लोगों ने चौहान बिरादरी वाले को अपना नेता चुना. एक बार फिर दारा चौहान घोसी से BJP के टिकट पर हुंकार भर रहे हैं. उपचुनाव में इस बार का ट्रेंड ये चल रहा है कि यहां की जनता बाहरी के बजाय स्थानीय को चुनने की मंशा ज़ाहिर कर रही है. ख़बर ये है कि लोग लगातार इसी बात को चर्चा का केंद्र बनाकर वोटिंग कर रहे हैं.

सपा के सुधाकर सिंह ने लोगों से अपील की है कि वो घोसी के लिए ही सारी राजनीतिक लड़ाई लड़ते रहे हैं. इसीलिए, जीत या हार के बावजूद पाला नहीं बदला. वहीं, दारा चौहान को लेकर पहले से ही लोगों की ये शिकायत थी कि वो 2022 का चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र में आए ही नहीं. सपा ने इसी बात को मुद्दा बनाया और उन्हें बाहरी बताकर जनता की नज़रों में ख़ारिज करने की कोशिश में जुटी है.

दारा सिंह चौहान भी बाहरी बनाम स्थानीय वाले मुद्दे का असर जानते हैं. इसीलिए, उन्होंने लोगों के बीच जाकर ये प्रचार किया है कि घोसी उनका भी घर है. हालांकि, उन पर दल बदल करके अपने राजनीतिक हित साधने के आरोप लग रहे हैं. फिर भी वो ख़ुद को घोसी वालों का नेता साबित करने के लिए सबकुछ दांव पर लगा चुके हैं. अब घोसी वालों को ये दिखाना है कि वो बाहरी बनाम स्थानीय के मुद्दे पर किस तरह का वोटिंग ट्रेंड अपनाते हैं.

घोसी विधानसभा सीट पर 4 लाख 30 हज़ार से ज़्यादा वोटर हैं. इनमें 80 हज़ार मुस्लिम, 70 हज़ार मल्लाह, 40 हज़ार यादव, 35 हज़ार ठाकुर, 45 हज़ार चौहान, 35 हज़ार राजभर, 60 हज़ार दलित मतदाता हैं. इसके अलावा ब्राह्मण, बनिया और लोहार मिलाकर क़रीब 35 हज़ार मतदाता हैं. सपा और BJP दोनों का सारा चुनावी समीकरण इन्हीं बिरादरियों पर टिका है. सपा मुस्लिम, पिछड़े और अति पिछड़ों के साथ जीत का ताना-बना बुन रही है, तो BJP चौहान, राजभर, सवर्ण और भूमिहार वोटबैंक के भरोसे है.

घोसी के वोटिंग ट्रेंड में हर बार बस्तियों के वोट सबसे अहम होते हैं. ये अलग-अलग बिरादरियों की बस्तियां हैं. चौहान बस्ती, राजभर बस्ती, ब्राह्मण टोला, भूमिहार बस्ती, मुस्लिम बस्ती और मल्लाह बस्ती. ये सारी बस्तियां एकसाथ एकजुट होकर वोट करती हैं. यहां रहने वाले लोग बूथ पर जाने से पहले आपस में जीत-हार के गणित पर चर्चा करते हैं. फिर मतदान के लिए जाते हैं. इसलिए इन बस्तियों में बनाए गए पोलिंग बूथ पर BJP और सपा दोनों ने सारी ताक़त झोंक रखी है.

https://youtu.be/zMkDDef4qi4?si=3sIFap5UoRa-b5EV

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