Bihar News: बिहार में जहरीली शराब पीने से मौत का क्रम लगातार जारी है. नया मामला सारण जिले से सामने आया है जहां जहरीली शराब से 10 लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है. (Bihar News) जबकि कई लोगों की हालत अभी भी खराब है. इन सभी का इलाज चल रहा है. छपरा सदर अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए 10 लोगों के शव पहुंचाए जा चुके हैं जबकि मसरख सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भी कई बीमार लोगों का इलाज जारी है।
आपको बता दे की परवार वालो का कहना है कि सभी लोग एक साथ शराब पीने के कारण बीमार हो गए (Bihar News) जिन्हें अस्पताल लाया गया लेकिन अस्पताल में भी उचित इलाज नहीं हुआ. लगातार बढ़ रहे मौत के मामलों को देखते हुए प्रशासन इलाकों में स्वास्थ विभाग की टीम भेज दिया है.(Bihar News) इसके साथ ही आशा कार्यकर्ताओं को भी बीमार लोगों की तलाश में लगा दिया गया है. अब तक जो आंकड़े सामने आए हैं उसके अनुसार इशुआपुर मसरख ,अमनौर में 10 लोगों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है।

उत्पाद अधीक्षक रजनीश कुमार ने बताया कि प्रभावित इलाकों में उत्पाद विभाग की टीम ने भी छापेमारी शुरू कर दी है और शराब को जब्त करने का काम चल रहा है. लेकिन, (Bihar News) जिन लोगों के परिजन इस कांड में अपनी जिंदगी गवा चुके हैं उनका रो रो कर बुरा हाल है. इस बीच छपरा में संदिग्ध परिस्थितियों में कई लोगों की मौत के बाद शराबबंदी को लेकर आम लोग सवाल खड़े कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि सूचना देने के बावजूद पुलिस शराब बेचनेवालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती; जबकि आमलोगों को परेशान करती है, जिसके कारण इस तरह की घटनाएं हो रही हैं।

बिहार में जहरीली शराब पीने से कब-कब हुई मौतें
बिहार में जहरीली शराब पीने से मौत का ये कोई पहला मामला नहीं है। 5 अगस्त 2022 को बिहार के सारण जिले में जहरीली शराब से 9 लोगों की मौत हुई थी और 17 लोगों ने अपनी आंख की रोशनी को खो दी थी। वहीं 21 मार्च 2022 को बिहार के तीन जिलों में जहरीली शराब पीने से 37 लोगों की मौत हो गई थी।

जेडीयू विधायक ने की शराबबंदी कानून के समीक्षा की मांग
हालांकि, अब नीतीश (Nitish) की पार्टी से ही शराबबंदी कानून के समीक्षा की डिमांड उठी है। जेडीयू विधायक डॉ. संजीव कुमार (Shnjiv Kumar) ने सीएम नीतीश के शराबबंदी कानून पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे पूरी तरह विफल करार दिया। यही नहीं उन्होंने इसके कार्यान्वयन के नाम पर दलितों और अति पिछड़ी जातियों (ईबीसी) के लोगों के निरंतर दमन को रोकने के लिए इसकी समीक्षा की भी मांग की।
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