Lucknow: क्या संसद को बार-बार ठप करना ठीक है? क्या है विपक्ष और सरकार की मंशा? क्या मजबूरी?

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Lucknow: दुनिया ने शासन के बेहतरीन मॉडल के तौर पर संसदीय लोकतंत्र को ही मान्यता दी है। इस व्यवस्था में संसद सर्वोच्च होती है, इसी वजह से उम्मीद की जाती है कि संसदीय चर्चाओं से देश को दिशा मिल सकती है। लेकिन हाल के वर्षों में तकरीबन हर संसदीय सत्र में विपक्षी खेमे ने एक तरह से हंगामा और कार्यवाही को बाधित करने की आदत बना ली है। विपक्षी तर्क हंगामा और बाधा को डंके की चोट पर लोकतंत्र की परिभाषा में फिट भी कर देता है। लेकिन सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी होती है कि संसद की बैठकें हों, कानून पारित हों, ताकि व्यवस्था में कोई रुकावट नहीं आए।वैसे तो उम्मीद नहीं थी कि संसद का मॉनसून सत्र बहुत बेहतर रहेगा। मणिपुर में जारी हंगामा और कुछ महीनों बाद राज्य राज्यों में होने वाले चुनाव- इसके दो ठोस कारण थे। संसद का सत्र ऐसे सवालों को उठाने का बेहतरीन मौका होता है। इसलिए विपक्ष का हंगामा जारी है और यह संसदीय सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता जा रहा है। किसी को इसकी चिंता नहीं कि हंगामे के चलते देश के करदाताओं की जेब पर कितनी चपत पड़ती है।संसद की कार्यवाही पर हर घंटे औसतन डेढ़ करोड़ रुपये यानी हर मिनट करीब ढाई लाख रुपये खर्च होते हैं।संसद के बजट सत्र के दूसरे हिस्से में 21 दिन हंगामा हुआ, शोर-शराबे के बीच सिर्फ छह बिल पास हुए और संसद की बैठक पर देश के करदाता का दो सौ करोड़ स्वाहा हो गया। दिलचस्प यह है कि यह सब लोकतंत्र के नाम पर हुआ। बहरहाल, विपक्ष की मांग है कि मणिपुर में महिलाओं के साथ मई के पहले हफ्ते में हुई बदसलूकी की घटनाओं पर चर्चा हो। सरकार चर्चा के लिए तैयार भी है। लेकिन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक विपक्ष चर्चा को तैयार नहीं दिख रहा। हालांकि उसका अब भी आरोप है कि सरकार ही नहीं चाहती कि मणिपुर पर चर्चा हो।मणिपुर में अंतहीन हिंसा ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की उस साख पर सवालिया निशान ही लगाए हैं, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले नौ साल से अपनी कूटनीति के जरिए बढ़ाने में जुटे रहे हैं। जो देश पूरे विश्व को शांति का उपदेश देता है और जिसे रूस-यूक्रेन के युद्ध में भी स्वीकार्य मध्यस्थ के रूप में देखा जाता है, वह अपने ही एक छोटे-से राज्य में जारी जातीय हिंसा पर ढाई महीने तक नियंत्रण न पा सके तो क्या संदेश जाता है? फिर भी मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह अपने पद पर बरकरार हैं और संसद में मणिपुर पर चर्चा तक नहीं हुई, जबकि यूरोपीय संसद और ब्रिटेन की संसद में भी जलता मणिपुर गूंज चुका है।कुछ साल पहले की बात है। संसद सत्र के दौरान दिल्ली के कुछ स्कूली बच्चे संसद की कार्यवाही देखने पहुंचे। लेकिन उनके दौरे के वक्त संसदीय कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ गई। और वापस लौटते समय बच्चों का कहना था कि इतना हंगामा तो हमारी स्कूली लड़ाइयों में भी नहीं होता था। मणिपुर सरकार की नाकामी का सबूत सिर्फ यही नहीं है कि तीन मई से शुरू मैतेई-कुकी हिंसा अभी तक जारी है, बल्कि यह भी कि चार मई को दो मणिपुरी महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने, उनसे बलात्कार और उस दौरान पुलिस के मूकदर्शक बने रहने की शर्मनाक घटना का पता 19 जुलाई को उसका विडियो वायरल होने पर ही चल पाया।इसी मांग को लेकर जारी हंगामे के चलते आप सांसद संजय सिंह राज्यसभा के पूरे सत्र के लिए निलंबित किए जा चुके हैं। समूचे विपक्ष की नजर में यह अलोकतांत्रिक कार्रवाई है।लेकिन 24 जुलाई को राजस्थान विधानसभा में कांग्रेसी विधायकों ने अपने ही पूर्व मंत्री राजेंद्र गुढ़ा से धक्का-मुक्की की। गुढ़ा को निलंबित करके ज़बरदस्ती विधानसभा से बाहर कर दिया गया।गुढ़ा का गुनाह बस ये रहा कि उन्होंने मणिपुर के बजाय राजस्थान में इसी महीने हुए महिला अपराधों का सवाल उठा दिया। उन्हें विधानसभा से निलंबित तब किया गया, जब वह एक डायरी सदन में पेश करना चाहते थे। उनका दावा है कि उसमें अशोक गहलोत सरकार के काले कारनामों का चिट्ठा दर्ज है। खैर, जब यह मसला किसी भी तरह सुलझता नहीं दिखा कि मणिपुर की घटनाओं पर बहस नियम 267 के तहत हो या 176 के तहत, तब विपक्ष ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान कर दिया। अब स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का समय तय करेंगे। लेकिन सरकार की संसद में चर्चा की अपनी ही रणनीति है। वह मणिपुर पर चर्चा के बहाने राजस्थान और पश्चिम बंगाल में जारी महिला अपराधों से जुड़े तथ्य भी रखने की तैयारी में है।सीमावर्ती राज्य की संवेदनशीलता के मद्देनजर केंद्र सरकार को भी तत्काल कदम उठाने चाहिए थे, लेकिन शायद कर्नाटक विधानसभा चुनाव में व्यस्तता आड़े आ गई। उसके बाद भी हालात सुधरे तो हरगिज नहीं। यह अस्वाभाविक नहीं कि नाकामी पर चिंता की आंच केंद्र सरकार तक भी पहुंची। सर्वदलीय चर्चा के जरिये केंद्र सरकार इस चिंता को सकारात्मक दिशा दे सकती थी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मणिपुर पर बोलने में लगभग ढाई महीना लग गया। वह भी तब बोले, जब संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ, मणिपुर की महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने और उनसे बलात्कार का विडियो देश ही नहीं, दुनिया में वायरल हो गया और सुप्रीम कोर्ट ने स्वत:संज्ञान लेते हुए कड़ी कार्रवाई के लिए कहा। प्रधानमंत्री ने मीडिया को संक्षिप्त संबोधन में मणिपुर की इस घटना को पूरे देश को शर्मसार करने वाला तो बताया, लेकिन यह नहीं बताया कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? मणिपुर पर प्रधानमंत्री के लंबे मौन और फिर उसी घटना के साथ विपक्ष शासित राज्यों की मिलती-जुलती घटनाओं के भी जिक्र से एक शर्मनाक प्रकरण के राजनीतिकरण के आरोपों को बल ही मिलता है।हालांकि जख्म आसानी से नहीं भरते, पर प्रधानमंत्री अपने गंभीर चिंता वाले बयान से मणिपुर पर मरहम अवश्य लगा सकते थे। उन जैसा चतुर राजनेता कैसे चूक गया, यह समझ से परे है।सरकार ने दूरदर्शिता दिखाई होती तो शायद मणिपुर पर यूरोपीय संसद, ब्रिटिश संसद और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भारत के शासन तंत्र पर सवाल उठाने और नसीहत देने का मौका नहीं मिलता।यूरोपीय संसद में तो यह मुद्दा तब गूंजा, जब प्रधानमंत्री फ्रांस की राजकीय यात्रा पर थे। फ्रांस ने हमारे प्रधानमंत्री को सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित भी किया, पर यूरोपीय संसद में मणिपुर के हालात पर भारत को कठघरे में खड़ा किए जाने से किसका कितना मान बढ़ा? हमारे विदेश मंत्रालय ने मणिपुर को आंतरिक मसला बताते हुए इस पर कड़ी आपत्ति जताई, पर भूल गए कि मामले तभी तक आंतरिक रहते हैं, जब उन्हें घर की चहारदीवारी से बाहर जाने से पहले सुलझा लिया जाए। हमने वह मौका गंवा दिया तो दुनिया को हमें नसीहत देने का मौका मिल गया कि जातीय हिंसा और उसमें धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने से रोकने के लिए भारत ठोस कदम उठाए।ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक तो मोदी के बड़े प्रशंसक हैं, पर धार्मिक स्वतंत्रता पर उन्हीं की दूत एवं ब्रिटिश सांसद फियोना ब्रूस ने पिछले सप्ताह अपने देश की संसद में मणिपुर का मामला उठाया और विभिन्न रिपोर्टों के माध्यम से जो तस्वीर पेश की, वह भारत को कठघरे में खड़ा करने वाली है। ऐसे में यह कतई अस्वाभाविक नहीं है कि देश में विपक्ष ने संसद में प्रधानमंत्री के बयान की मांग की। उसके जरिए मणिपुर हिंसा पर चर्चा भी होती ही, लेकिन चर्चा के नियम को लेकर पूरे मामले को उलझाते हुए विपक्ष को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। विपक्ष नियम 267 के तहत अन्य काम रोककर पूरे दिन चर्चा और प्रधानमंत्री का बयान चाहता था, लेकिन सरकार नियम 176 के तहत ढाई घंटे की चर्चा और गृह मंत्री अमित शाह के बयान के लिए ही तैयार थी। सवाल अनुत्तरित ही रहा कि ढाई महीने से भी ज्यादा समय से हिंसा झेल रहे मणिपुर पर देश की संसद एक दिन चर्चा क्यों नहीं कर सकती और प्रधानमंत्री को ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर बयान देने से क्यों बचना चाहिए? विधायी कार्य भले ही चलते रहें, लेकिन देश हित में चर्चा की दृष्टि से मॉनसून सत्र में संसद अभी तक बाधित ही रही। राजनीतिक दांव-पेच की बंधक बनी संसद को गतिरोध से निकालने का रास्ता भी अविश्वास प्रस्ताव के रूप में विपक्ष ने ही खोजा, जिस पर होने वाली चर्चा का जवाब प्रधानमंत्री को ही देना होगा। लोकसभा में सत्ता पक्ष को हासिल विपक्ष से दो गुणा से भी ज्यादा सांसदों के समर्थन के मद्देनजर अविश्वास प्रस्ताव का अंजाम सबको मालूम है, पर इससे जाने वाला राजनीतिक संदेश ज्यादा महत्वपूर्ण है। साख और सत्ता, दो अलग-अलग चीजें हैं, पर साख के बगैर सत्ता का ज्यादा अर्थ नहीं रह जाता।वर्तमान सरकार के आंकड़ों के मामले में विपक्ष पर बहुत भारी है। विपक्ष की मांग है कि प्रधानमंत्री मणिपुर के मुद्दे पर संसद में जवाब दें। लेकिन विपक्ष को अभी तक अपने प्रयासों में सफलता नहीं मिल पाई है। माना जा रहा है कि अब विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव को एक टूल के रूप में इस्तेमाल करेगा। इससे प्रधानमंत्री को संसद में आकर चर्चा का जवाब देना पड़ेगा। देश के संसदीय इतिहास में अब तक कुल 27 बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए हैं। इसमें तीन बार सरकारें गिरी हैं और प्रधानमंत्री को इस्तीफा भी देना पड़ा है। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सबसे ज्यादा 15 बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा है लेकिन हर बार वह अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहीं। अटल बिहारी वाजपेयी, एचडी देवे गौड़ा और वीपी सिंह की सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में हार गई। लिहाजा उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। संसदीय इतिहास में पहला अविश्वास प्रस्ताव प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में आया था।1963 में जेबी कृपलानी ने इस प्रस्ताव को रखा था। उस वक्त नेहरू जी की सरकार सदन में जीत गई थी। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 62 और विरोध में 347 वोट पड़े थे।मोदी सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव 1918 में लाया गया था। लेकिन यह प्रस्ताव गिर गया था। मोदी सरकार ने आसानी से सदन में बहुमत साबित कर दिया था। इस दौरान संसद में 11 घंटे तक बहस चली थी जिसका जवाब पीएम मोदी ने दिया था, दुर्भाग्य ही है कि देशविरोधी तत्वों की इस कारगुजारी पर विपक्ष का ध्यान नहीं है। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के वक्त ये तथ्य भी रेकॉर्ड पर आएंगे। तब विपक्षी खेमे के नैरेटिव की पोल खुलेगी। आखिर में एक तथ्य और, अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष ने एक बार फिर प्रधानमंत्री को बड़ा हथियार मुहैया करा दिया है। जब वे चर्चा का जवाब देंगे, तब तकरीबन पूरे देश की उन पर निगाह होगी। स्वाभाविक ही उनकी कोशिश अपनी बातों से देश को प्रभावित करने की होगी। मणिपुर मुद्दे पर भी सरकार के तैयार होने के बावजूद विपक्ष की ओर से अविश्वास प्रस्ताव आने का संदेश साफ है। विपक्ष अपनी सरकारों के दामन पर लग रहे दाग नहीं दिखाना चाहता। चूंकि आम चुनाव नजदीक हैं, इसलिए वह बीजेपी की चादर को ज्यादा मैली दिखाना चाहता है, ताकि उसे सियासी फायदा मिल सके। जब चर्चा होगी तो मणिपुर से जुड़े अन्य तथ्य भी सामने आएंगे।

एडिटर-इन-चीफ सुनील कुमार वर्मा “सोनू”

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