Santoshi Mata Vrat Katha: शुक्रवार व्रत में जरूर पढ़ें, संतोषी माता की व्रत कथा

Santoshi Mata Vrat Katha, संतोषी माता व्रत कथा, शुक्रवार व्रत कथा, Shukravar Vrat Katha
Facebook
X
WhatsApp

Santoshi Mata Vrat Katha: साप्ताहिक व्रत में शुक्रवार के दिन माता संतोषी का व्रत किया जाता है, इस व्रत को करने से संतोषी माता प्रसन्न होकर सुख, शांति, पैसा, व अमर सुहाग का वरदान देती हैं। इस व्रत को नियमित रूप से रखने वाले जातकों को माता धन-धान्य, अन्न व समस्त सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कर देती हैं। इसलिए शुक्रवार को जो जातक व्रत रखते हैं उन्हें यह संतोषी माता व्रत कथा का पाठ और श्रवण अवश्य करना चाहिए।

शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा (Shukravar Vrat Katha)

एक गांव में एक बुढिया रहती थी जिसके सात बेटे थे। छः बेटे कमाने वाले थे और एक बेटा निकम्मा था। बुढिया मां छहों पुत्रों का जूठा सातवें पुत्र को देती। सातवां पुत्र एक दिन अपनी पत्नी से बोला, “देखो। मेरी माता का मुझ पर कितना प्रेम है। वह बोली, “क्यों नहीं, सबका जूठा बचा हुआ तुमको खिलाती है।” वह बोला, “जब तक आंखों से न देखें मान नहीं सकता ‘पत्नी ने हंसकर कहा, “देख लोगे तब तो मानोगे ?”

कुछ दिन बाद एक बड़ा त्योहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड्डू बने। वह पत्नी की बात को जांचने के लिए सिरदर्द का बहाना बनाकर पतला कपड़ा सिर पर ओढ़कर रसोई में जाकर सो गया और कपड़े में से सब देखता रहा। छहों भाई भोजन करने आए। उसने देखा, मां ने उनके लिए सुंदर-सुंदर आसन बिछाए, सात प्रकार की रसोई परोसी और आग्रह कर-करके उन्हें भोजन कराती रही। वह देखता रहा।

छहों भाई भोजन कर उठ गए तब मां ने उनकी 5 थालियों में से लड्डुओं के टुकड़ों को उठाया और एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर मां ने उसे पुकारा, “उठ बेटा! उठ! तेरे भाइयों ने भोजन कर लिया, तू भी उठकर भोजन कर ले।” उसने कहा, मां! मुझे भोजन नहीं करना। मैं परदेस जा रहा हूं। “माता ने कहा, ‘कल जाना हो तो आज ही जा।” वह बोला, हां हां, जा रहा हूं यह कहकर वह घर से निकल गया। चलते समय उसे पत्नी की याद आई। वह गौशाला में कंडे थाप रही थी। वहां जाकर वह बोला, ‘मेरे पास तो कुछ नहीं है। यह अंगूठी है, सो ले लो और अपनी कोई निशानी मुझे दे दो।” वह बोली, “मेरे पास क्या है ? यह गोबर भरा हाथ है।” यह कहकर पत्नी ने उसकी पीठ पर गोवर के हाथ की थाप मार दी।

वह चल दिया। चलते-चलते दूर देश में पहुंचा। वहां एक साहूकार की दुकान थी। वहां जाकर बोला, “सेठ जी, मुझे नौकरी पर रख लो।” साहूकार को नौकर की सख्त जरूरत थी। साहूकार ने कहा, ‘काम देखकर तनख्वाह मिलेगी।” उसने कहा, “सेठजी जैसा आप ठीक समझें।” उसे साहूकार के यहां नौकरी मिल गई। वह वहां दिन-रात काम करने लगा। कुछ दिन में दुकान का लेन-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना, सारा काम करने लगा।

साहूकार के सात-आठ नौकर थे। वे सब चक्कर खाने लगे। लेकिन उसने अपनी लगन, परिश्रम और ईमानदारी से सभी को पीछे छोड़ दिया। उसे अपने किए का फल मिला। सेठ ने भी उसका काम देखा और तीन महीने में ही उसे मुनाफे में साझीदार बना लिया। परिश्रम करते- करते बारह वर्ष में ही वह नगर का नामी सेठ बन गया और सेठ अपना सारा कारोबार उस पर छोड़कर बाहर चला गया।

इधर उसकी पत्नी पर क्या बीती वह सुनें। सास-ससुर उसे दुख देने लगे। गृहस्थी का काम करवाकर उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर की रोटियों के आटे से जो भूसी निकलती, उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल की नरेली में पानी दिया जाता। इस तरह दिन बीतते रहे। एक दिन वह जब जंगल में लकड़ी लेने जा नही थी तब उसे रास्ते में बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दीं। यह वहां खड़ी होकर पूछने लगी, “बहनो, यह तुम किस देवता का व्रत करती हो और इसके करने से क्या फल होता है? इस व्रत के करने की क्या विधि है? यदि तुम अपने इस व्रत का विधान मुझे समझाकर कहोगी तो मैं तुम्हारा। बड़ा अहसान मानूंगी।”

उनमें से एक स्त्री बोली, “सुनो, यह संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है, लक्ष्मी आती हैं। मन की चिंताएं दूर होती हैं। मन को प्रसन्नता और शांति मिलती है। निपूती को पुत्र मिलता है. प्रीतम बाहर गया हो तो वह शीघ्र लौट आता है. कुवारी कन्या को मन पसंद वर मिलता है, चलता मुकदमा खत्म हो जाता है. कलह क्लेश की निवृत्ति हो, मुख-शांति होती है, घर में धन जमा हो धन-जायदाद का लाभ होता है तथा और भी मन में जो कुछ कामना हो सब संतोषी माता की कृपा से पूरी हो जाती हैं। इसमें संदेह नहीं।”

शुक्रवार व्रत में संतोषी माता की इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए, पूजा के समय उपस्थित सभी लोगों को यह कथा सुनानी भी चाहिए। इससे माँ संतोषी की कृपा कथा सुनने वालों को भी मिलती है। कथा के बाद आरती करनी चाहिए और भक्ति पूर्वक प्रसाद वितरण करना चाहिए तत्पश्चात स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।

The specified slider does not exist.

ताजा खबरें