UP BJP Voter Loss in SIR: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस वक्त एक ऐसा ज्वालामुखी फटा है जिसकी तपिश ने सत्ताधारी दल से लेकर विपक्ष तक को हिला कर रख दिया है। चुनाव आयोग द्वारा जारी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के ड्राफ्ट ने उन तमाम दावों की हवा निकाल दी है जो अब तक चुनावी रैलियों में गूंज रहे थे। (UP BJP Voter Loss in SIR) एक तरफ विपक्ष इसे ‘मिनी एनआरसी’ बताकर अल्पसंख्यकों और दलितों के नाम काटे जाने का डर फैला रहा था, वहीं जब आंकड़े सामने आए तो हकीकत बिल्कुल इसके उलट निकली। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा ‘शॉक’ सत्ताधारी बीजेपी को लगा है। आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि जिन इलाकों को बीजेपी का अभेद्य किला माना जाता था, वहीं सबसे ज्यादा वोटों की कैंची चली है। क्या 2027 के चुनाव से पहले बीजेपी के ‘सपोर्ट बेस’ को बहुत बड़ी चोट पहुंची है?
UP BJP Voter Loss in SIR: मुस्लिम बहुल जिलों में सबसे सुरक्षित वोट
पिछले कई महीनों से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल एसआईआर प्रक्रिया को अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक साजिश बता रहे थे। (UP BJP Voter Loss in SIR) दावा किया जा रहा था कि इस बहाने मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के वोट काटे जा रहे हैं। लेकिन 6 जनवरी 2026 को जारी आंकड़ों ने इस ‘नैरेटिव’ को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। ताज्जुब की बात यह है कि उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल जिलों में नाम कटने की दर हिंदू बहुल और शहरी क्षेत्रों के मुकाबले काफी कम रही।
सहारनपुर में 16.37%, मुरादाबाद में 15.76% और अमरोहा में तो महज 13.22% वोट ही डिलीट हुए हैं। इसके पीछे एक रोचक वजह सामने आ रही है। (UP BJP Voter Loss in SIR) जानकारों का मानना है कि नागरिकता और योजनाओं के छिन जाने के डर से मुस्लिम वोटर्स ने फॉर्म भरने में काफी मुस्तैदी दिखाई, जबकि हिंदू वोटर्स और बीजेपी समर्थकों में भारी लापरवाही देखने को मिली।
बीजेपी के ‘स्ट्रांगहोल्ड’ पर चली कैंची
एसआईआर की इस प्रक्रिया ने बीजेपी के रणनीतिकारों की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। (UP BJP Voter Loss in SIR) जिन शहरी इलाकों में बीजेपी एकतरफा जीत दर्ज करती आई है, वहां वोटर्स की संख्या में भारी गिरावट आई है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में करीब 30% वोट लिस्ट से बाहर हो गए हैं। इसी तरह गाजियाबाद में 28% और गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) में 23.7% वोटर्स डिलीट हुए हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही इस खतरे को भांप लिया था और कार्यकर्ताओं को चेतावनी दी थी कि 4 करोड़ ‘मिसिंग’ वोटर्स में से 85-90% बीजेपी समर्थक हो सकते हैं। शहरों में रहने वाले उन लोगों के नाम सबसे ज्यादा कटे हैं जिनकी डुप्लीकेट एंट्री थी या जिन्होंने अपने गांव और शहर दोनों जगह वोटर आईडी बनवा रखी थी। अब प्रति विधानसभा सीट पर 61,000 से 84,000 वोटों का यह संभावित नुकसान बीजेपी के लिए 2027 में बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकता है।
प्रवासी और डुप्लीकेट वोटर्स का गणित
पूर्वांचल के जिलों जैसे वाराणसी, जौनपुर और गाजीपुर से भारी संख्या में लोग दिल्ली, मुंबई और गुजरात जैसे राज्यों में काम करते हैं। (UP BJP Voter Loss in SIR) ड्राफ्ट रोल के मुताबिक, करीब 2.17 करोड़ लोग ‘शिफ्टेड’ या ‘माइग्रेटेड’ पाए गए हैं। विपक्ष का आरोप है कि प्रवासियों के नाम काटकर उनके अधिकारों को छीना गया है। लेकिन यहाँ भी नुकसान बीजेपी को ही होता दिख रहा है। बिहार के चुनावी ट्रेंड बताते हैं कि बाहर काम करने वाले प्रवासी श्रमिक अक्सर एनडीए (बीजेपी गठबंधन) को वोट देते हैं। ऐसे में इन प्रवासियों के नाम कटना बीजेपी के लिए ‘साइलेंट वोट बैंक’ के खत्म होने जैसा है।
देशभर का हाल: यूपी में हर 100 में से 19 नाम कटे
अगर हम पूरे देश के 12 राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि कुल 6.59 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे ऊपर है। (UP BJP Voter Loss in SIR) यूपी में हर 100 में से 19 वोटर्स लिस्ट से बाहर हुए हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा महज 8 वोट प्रति 100 वोटर्स है। गुजरात में 15 और मध्य प्रदेश-राजस्थान में 7.5 प्रतिशत नाम कटे हैं। यूपी के 15.44 करोड़ वोटर्स में से अब केवल 12.55 करोड़ ही बचे हैं। (UP BJP Voter Loss in SIR) यानी राज्य का हर पांचवां वोटर फिलहाल लिस्ट से बाहर है। हालांकि, यह अंतिम सूची नहीं है। 6 फरवरी 2026 तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराई जा सकती हैं। अब देखना यह है कि बीजेपी अपने ‘लापता’ वोटर्स को वापस लिस्ट में लाने के लिए किस हद तक जमीन पर उतरती है।















