खाद्य पदार्थों में मिलावट का खेल कड़े कानून के बाद भी जारी है। इसके उपयोग से लोगों को बीमारियां घेर रही हैं, लेकिन मिलावटखोर सलाखों के पीछे नहीं जा पा रहे हैं। मिलावट के कारोबार पर नजर रखने की जिम्मेदारी खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की है। लेकिन विभाग खास मौकों यानी त्योहार पर सक्रिय होता है।
यह सक्रियता भी केवल नमूने लेकर जांच के लिए भेजने तक है। जांच रिपोर्ट 14 दिन में देने का प्रावधान है, लेकिन छह माह बाद भी रिपोर्ट नहीं मिल पा रही है। ऐसे में मिलावटखोरों के हौसले बुलंद है। जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए लोगों को जिम्मेदारों से कार्रवाई की दरकार है।2019 से अबतक विभाग ने खाद्य पदार्थों के 2,240 नमूने लेकर जांच के लिए लखनऊ स्थित खाद्य प्रयोगशाला भेजे हैं। 728 नमूने जांच के दौरान फेल साबित हुए हैं। जांच में हर तीसरा सैंपल फेल हो रहा है।
इस पर 161 प्रतिष्ठान के मालिकों के खिलाफ कोर्ट में वाद दायर किया गया है। इनपर चार करोड़ का जुर्माना लगाया गया है। कई जांच नमूनों की रिपोर्ट लंबित है। खाद्य पदार्थों में मिलावट, नकली ब्रांड और घटिया गुणवत्ता के मामले बढ़े हैं।
मुनाफाखोरी और व्यापार की प्रतिस्पर्धा के कारण मिलावट का यह खेल बेधड़क चल रहा है। दाल, दूध, मावा, घी, मसाले, आटा, फल-सब्जियां सहित खाने-पीने की लगभग हर चीज में मिलावट हो रही हैं। कंपनियों के उत्पाद भी गुणवत्ता के पैमाने पर खरे नहीं उतर रहे हैं। जिला खाद्य अधिकारी संजय शर्मा ने बताया कि मिलावटी खाद्य पदार्थों के नमूने जांच के लिए भेजे जा रहे हैं। मापदंडों पर खरे न उतरने वाले खाद्य पदार्थ बेचने वाले दुकानदारों के खिलाफ विभाग द्वारा कार्रवाई की सिफारिश की गई है।









