एनसीटीई के नये नियम से अभ्यर्थियों में दुविधा

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नई दिल्ली 20 अक्टूबर-देश में शिक्षा के महत्व को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) समय-समय पर शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन करते रहती है। उदाहरणतः हाल ही में बीएड के पाठ्यक्रमों में बदलाव आना इस परिषद की भूमिका को दर्शाता है। इस परिषद की स्थापना के पश्चात शिक्षक-शिक्षा की गुणवत्ता में निश्चित ही वृद्धि हुई है। वर्तमान शिक्षक-शिक्षा का पाठ्यक्रम अधिक सामाजिक है। शिक्षक शिक्षा के पाठ्यक्रम में बाल मनोविज्ञान एवं मनोविज्ञान की समस्त विशेषताओं को सम्मिलित किया गया हैं।

जाहिर है कि देश में एनसीटीई की स्थापना के पश्चात शिक्षक-शिक्षा से संबंधित पाठ्य-पुस्तकों की गुणवत्ता में सुधार आया है। जिसमें छात्र वास्तविक समस्याओं से अवगत हो पाते है और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप खुद को तैयार करते हैं। परिषद का शिक्षक-शिक्षा में बेहद अहम योगदान है।

एनसीटीई द्वारा बिना राज्य सरकारों की परामर्श के 28 जून 2018 को जारी किए गए शिक्षक नियुक्ति योग्यता प्रपत्र कक्षा 1 से 5 तक शिक्षक नियुक्ति में डीएलएड के साथ बीएड की योग्यता रखने वाले अभ्यर्थियों को शामिल करने पर विचार किया गया है। यदि ऐसा होता हैं तो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से जानी जाने वाली डीएलएड (डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एज्युकेशन) की योग्यता रखने वाले अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।

इन अभ्यर्थियों के लिए एक मात्र भर्ती परीक्षा लेवल प्रथम कक्षा 1 से 5 तक शिक्षक बनने की है यदि यह हक़ ही इन अभ्यर्थियों का छिना जाता है तो इनके द्वारा उच्च माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद दो वर्षीय शिक्षक प्रशिक्षण क्या काम का होगा। एनसीटीई का यह नियम इन छात्रों के लिए दुविधा बना हुआ हैं। लेकिन बीएड की योग्यता रखने वाले अभ्यर्थियों के लिए लेवल द्वितीय स्तर 6-8, द्वितीय श्रेणी शिक्षक एवं एमए के बाद स्कूल व्याख्याता बनने की योग्यता रखतें हैं।

जानकारों का मानना है कि एनसीटीई का यह नियम अलग-अलग राज्यों में तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती पूरी करवाने में बाधक बन रहा है। क्योंकि डीएलएड-बीएड विवाद को लेकर यह भर्तियां सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में अटकी हुई हैं। बिना जानकारी के एनसीटीई द्वारा लाया गया। यह नियम कहीं न कहीं रोजगार देने में बाधक बन रहा है। इस नियम को लेकर राज्य सरकारें भी अपना मत स्पष्ट नहीं कर पा रहीं है। क्योंकि सरकारें राजनीति के कारण वोट बैंक की सियासत के चंगुल में फंसी हुई हैं। इससे डीएलएड डिग्री धारी अभ्यर्थी संकट में फंसे हुए हैं।

गौरतलब है कि हाल ही में राजस्थान सरकार द्वारा 31 हज़ार पदों पर तृतीय श्रेणी शिक्षक के लिए रीट (राजस्थान शिक्षक पात्रता परीक्षा) का आयोजन करवाया गया था। जो वाकई अपने आप में अद्भुत था। राजस्थान सरकार और राजस्थान वासियों के लिए। राज्य सरकार विद्यार्थियों के लिए आने जाने की सुविधा के लिए रोडवेज बसों के साथ-साथ प्राइवेट बसों की व्यवस्था नि:शुल्क कि गई थी, इसके साथ ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रदेश के समस्त सामाजिक संगठनों और लोगों से आह्वान किया था कि कोई भी विद्यार्थी इस परीक्षा के समय भूखा न रहे इसके लिए समस्त सामाजिक संगठनों और लोगों ने विद्यार्थियों के रहने, खाने की व्यवस्था नि:शुल्क कर रखीं थीं। यह सब राजस्थान के पर्यटन वाक्य “पधारो म्हारे देश” को चरितार्थ साबित करता हैं। बताते हैं कि प्रतियोगी परीक्षा के दौरान छात्रों की ऐसी मेहमान नवाजी शायद ही विश्व में कहीं देखने को मिलें। परीक्षार्थी इसे रीटोत्सव की संज्ञा दें रहें थे।

वहीं दूसरी तरफ एनसीटीई का नियम रीट परीक्षा में आफ़त बना हुआ हैं। बीएसटीसी-बीएड विवाद जयपुर हाईकोर्ट में लंबित है। प्रथम सुनवाई हाईकोर्ट द्वारा बीएड अभ्यर्थियों को लेवल प्रथम कक्षा 1-5 तक परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई हैं। लेकिन रिजल्ट पर रोक रहेंगी। यदि बीएड वाले लेवल प्रथम में शामिल होते हैं तो बीएसटीसी अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होगा। बीएसटीसी अभ्यर्थी खेताराम बांता बताते हैं कि बीएड वालों को लेवल प्रथम में शामिल किया जाता हैं तो हमारा हक़ छीना जाएगा।

तीन साल बाद रीट की परीक्षा हुई हैं इसी में हमें हमारा हक़ नहीं मिलता है तो हम कहां जाये और इस बीएसटीसी डिग्री का क्या करें। यदि लेवल प्रथम में बीएड वालों को शामिल करना ही तो सरकार हमें बीएसटीसी करवा ही क्यों रहीं हैं। इसको लेकर हम बीएसटीसी के समस्त छात्र अपने हक के लिए ‘बीएसटीसी संघर्ष समिति राजस्थान’ के बैनर तले जयपुर के शहीद स्मारक पर धरना प्रर्दशन कर रहे हैं। राज्य से हमारी मांग हैं कि राजस्थान सरकार एनसीटीई को पत्र लिखें की हमारे बीएसटीसी के अभ्यर्थी लेवल प्रथम शिक्षक के लिए पर्याप्त संख्या (लगभग चार लाख) में उपलब्ध है। हमें लेवल प्रथम शिक्षक के लिए अप्रशिक्षित बीएड अभ्यर्थियों की आवश्यकता नहीं है।

बीएसटीसी अभ्यर्थी प्रिया सुमन का कहना है कि हमारे अधिकतर छात्रों के 120-125 नंबर आ रहे हैं इसके बावजूद हमें सन्देह है कि बीएड वाले लेवल प्रथम में शामिल होते हैं तो हमारा तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती में नंबर नहीं आयेगा। इसलिए राजस्थान सरकार से दरख्वास्त हैं सरकार हाईकोर्ट में हमारी मजबूती के साथ पैरवी करें। और हमें हमारा हक़ दें नहीं तो हमारे भविष्य के ऊपर तलवार लटक जायेंगी। हमने एक दूसरे अभ्यर्थी महेंद्र सिंह राव से बात की वह बताते हैं कि राजस्थान सरकार आगामी 26 अक्टूबर बीएसटीसी-बीएड विवाद की हाईकोर्ट में सुनवाई होनी हैं इस सुनवाई में सरकार बीएसटीसी के अभ्यर्थियों की मजबूत सबूतों के साथ पैरवी करें। हम हमारे हक़ के लिए धरना प्रर्दशन कर रहे हैं। हमारा यह धरना पिछले 6-7 दिन से शहीद स्मारक, जयपुर पर चल रहा हैं। जब तक हमारी मांग पूरी नहीं होगी हम यहां से नहीं हटेंगे।

दरअसल भारतीय संविधान के निर्माण के समय सन् 1944 से शिक्षा तथा विश्वविद्यालय राज्य सूची के अंतर्गत रखे गए। केंद्र की गतिविधियों का केंद्रीय विश्वविद्यालयों तथा राष्ट्रीय महत्व की वैज्ञानिक और प्राविधिक शिक्षण संस्थाओं के परस्पर समन्वय तथा उच्च शिक्षा अथवा अनुसंधान एवं वैज्ञानिक और प्राविधिक संस्थाओं के मानकों के संकल्प तक सीमित कर दिया गया। व्यावसायिक तथा श्रमिकों को प्राविधिक शिक्षण केंद्र तथा राज्यों की समवर्ती सूची में रखा गया।

हालांकि आज यह अनुभव किया जाता है कि इस नवीन प्रजातंत्र में शैक्षिक प्रशासन का मुख्य कार्य शिक्षा को मानवीय रूप देना एवं जनता को प्रजातांत्रिक विधियों एवं स्थितियों में प्रशिक्षित करना है। नए शिक्षकों तथा निरीक्षण अधिकारियों को ऐसी विशिष्ट दृष्टि से संपन्न करना है, जिससे कि वे सत्ता की धौस जमाए बिना शिक्षार्थियों को प्रेरित कर सकें। बहरहाल एनसीटीई का यह नियम अलग-अलग राज्यों में लेवल प्रथम शिक्षक नियुक्ति के लिए बाधक बना हुआ हैं। यदि राज्यों में डीएलएड डिग्री धारी अभ्यर्थियों की संख्या पर्याप्त हैं तो ऐसे नियम की आवश्यकता क्यों पड़ी?

वरिष्ठ पत्रकार चौधरी अफज़ल नदीम की खास रिपोर्ट

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