25 Days of Sadhana: सिद्धपीठ दक्षिण काली मंदिर में भस्म आरती के बाद सामने आया दृश्य हर उस व्यक्ति को भावुक कर गया, जिसने इसे देखा। पच्चीस दिनों की कठोर साधना, प्रतिदिन 20 से 27 घंटे तक एक ही आसन पर बैठने के बाद पूज्य आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज जिस अवस्था में भस्म आरती में शामिल हुए, वह साधना, संकल्प और शिवभक्ति का अद्भुत दृश्य था।
लगातार इतनी लंबी साधना के बाद पूज्य महाराज जी के लिए खड़ा होना भी कठिन दिखाई दे रहा था। शरीर पीड़ा से गुजर रहा था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने भारी भस्म के थैले उठाकर भस्म आरती की। जिस अवस्था में सामान्य व्यक्ति के लिए खड़ा रहना भी मुश्किल हो, उस अवस्था में पूज्य गुरुदेव का शिवधुन में मग्न होकर भस्म आरती करना श्रद्धालुओं के लिए अकल्पनीय दृश्य था।
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आरती के दौरान उनके मुख से बार-बार “महादेव… महादेव…” का उच्चारण हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे शरीर की सारी पीड़ा पीछे छूट गई हो और उनकी चेतना पूरी तरह भोलेनाथ में लीन हो गई हो। वह शिव की धुन में ऐसे मग्न थे कि पीड़ा के बावजूद आरती में उनका समर्पण और भक्ति भाव लगातार बना रहा।
यह दृश्य देखकर वहां मौजूद श्रद्धालुओं की आंखों में आंसू आ गए। पूरा वातावरण शिवमय हो गया था। लोगों के मन में बार-बार एक ही भाव उमड़ रहा था कि पूज्य महाराज जी की साधना में शिव तत्व की अनुभूति होती है और ऐसा लगता है जैसे भोले बाबा का विशेष आशीर्वाद उन पर है।
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किसी ने इस दृश्य को अटूट तपस्या कहा, किसी ने शिवभक्ति की पराकाष्ठा, तो किसी ने इसे महादेव के प्रति पूर्ण समर्पण का जीवंत उदाहरण माना। पच्चीस दिनों की कठोर साधना के बाद भी भस्म आरती में उसी श्रद्धा, उसी ऊर्जा और उसी विश्वास के साथ शामिल होना यह दिखाता है कि उनके लिए साधना केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन का संकल्प है।
उस समय मंदिर परिसर में मानो हर ओर एक ही भाव था—पीड़ा शरीर में थी, लेकिन मन महादेव में था। कदम साथ नहीं दे रहे थे, लेकिन शिव का नाम रुक नहीं रहा था।
श्रद्धालुओं की आंखों में आंसू थे और वातावरण में सिर्फ एक ही धुन गूंज रही थी—
“महादेव… महादेव…”
यह भस्म आरती वहां मौजूद लोगों के लिए केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, बल्कि एक ऐसा भावुक और आध्यात्मिक क्षण बन गई, जिसे वे लंबे समय तक याद रखेंगे।
हर सांस में शिव… हर शब्द में महादेव…
हर हर महादेव! 🔱









