Nana Patekar Sanjay Dutt: फिल्मी दुनिया में रिश्तों की कहानियां अक्सर पर्दे पर दिखाई जाती हैं। लेकिन कभी-कभी पर्दे के पीछे की वास्तविक घटनाएं किसी फिल्म की कहानी से कहीं अधिक जटिल होती हैं। अभिनेता नाना पाटेकर और संजय दत्त के बीच लगभग तीन दशकों तक बनी रही दूरी भी ऐसी ही एक कहानी है। इसकी शुरुआत किसी फिल्म के सेट पर हुए विवाद, पेशेवर प्रतिस्पर्धा या व्यक्तिगत कहासुनी से नहीं। बल्कि 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों से जुड़ी थी। उन धमाकों में नाना पाटेकर के भाई की मृत्यु हो गई थी। बाद में जब अभिनेता संजय दत्त का नाम अवैध हथियार रखने के मामले में सामने आया, तो नाना पाटेकर ने उनके साथ कभी काम नहीं करने का सार्वजनिक फैसला किया। उन्होंने कई वर्षों तक इस निर्णय को दोहराया। लेकिन वर्ष 2025 में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने उनके पुराने फैसले को फिर चर्चा में ला दिया।
Nana Patekar Sanjay Dutt: मुंबई में वह दिन जब नाना पाटेकर ने अपने भाई को खो दिया
नाना पाटेकर और संजय दत्त दोनों फिल्म ‘हाउसफुल 5’ का हिस्सा बने। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या नाना पाटेकर ने संजय दत्त के प्रति अपनी पुरानी नाराजगी समाप्त कर दी थी? क्या उन्होंने उन्हें व्यक्तिगत रूप से माफ कर दिया था? या फिर दोनों कलाकारों का एक ही फिल्म में होना केवल एक पेशेवर निर्णय था, जिसका उनके व्यक्तिगत संबंधों से कोई लेना-देना नहीं था? इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए उस घटना को समझना जरूरी है, जिसने नाना पाटेकर के जीवन और संजय दत्त के प्रति उनके दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया था।
12 मार्च 1993 को तत्कालीन बंबई, जिसे आज मुंबई कहा जाता है, में एक के बाद एक हुए बम विस्फोटों ने पूरे देश को हिला दिया था। शहर के व्यावसायिक केंद्रों, होटलों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाकर किए गए इन हमलों में 257 लोगों की मृत्यु हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे भीषण आतंकवादी हमलों में से एक था। मुंबई स्टॉक एक्सचेंज, एयर इंडिया भवन के आसपास का इलाका, सेंचुरी बाजार और कई अन्य स्थान विस्फोटों की चपेट में आए। इन हमलों में मरने वाले अधिकांश लोग सामान्य नागरिक थे, जो उस दिन अपने कामकाज में व्यस्त थे। किसी ने अपना बेटा खोया, किसी ने पिता, किसी ने पति और किसी ने भाई। नाना पाटेकर का परिवार भी इस त्रासदी से अछूता नहीं रहा।
नाना पाटेकर के भाई उस दिन मुंबई की एक बस में यात्रा कर रहे थे। बस में हुए विस्फोट में उनकी मृत्यु हो गई। कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि विस्फोट के बाद शव की पहचान करना भी कठिन हो गया था और नाना पाटेकर ने अपने भाई के हाथ में पहने कड़े से उनकी पहचान की थी। इसी घटना से जुड़ा एक अन्य विवरण यह भी है कि उनके भाई की पत्नी पहले वाली बस से यात्रा कर चुकी थीं, जिसके कारण वह विस्फोट से बच गईं।
नाना पाटेकर के लिए भाई की मृत्यु एक व्यक्तिगत त्रासदी थी। मुंबई बम धमाकों के बाद लंबे समय तक जांच चली, अनेक लोगों की गिरफ्तारी हुई और अदालतों में मुकदमे चले। लेकिन जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया था, उनके लिए न्यायिक कार्यवाही से अलग एक व्यक्तिगत पीड़ा भी थी। नाना पाटेकर की संजय दत्त के प्रति नाराजगी को समझने के लिए इसी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखना आवश्यक है।
मुंबई बम धमाकों में संजय दत्त का नाम कैसे आया?
1993 के मुंबई बम धमाकों की जांच के दौरान अभिनेता संजय दत्त के पास अवैध हथियार होने की जानकारी सामने आई। उन्हें अप्रैल 1993 में गिरफ्तार किया गया। जांच में एके-56 राइफल और अन्य हथियारों से संबंधित तथ्य सामने आए। यह मामला इसलिए भी अत्यधिक चर्चित हुआ क्योंकि संजय दत्त उस समय हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेताओं में शामिल थे और उनके पिता सुनील दत्त एक प्रतिष्ठित अभिनेता तथा सांसद थे।
संजय दत्त के मामले में एक कानूनी अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है। उन पर आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम यानी टाडा के अंतर्गत भी आरोप लगाए गए थे, लेकिन अदालत ने उन्हें आतंकवादी साजिश में शामिल होने के आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि अवैध हथियार रखने के मामले में शस्त्र अधिनियम के तहत उन्हें दोषी पाया गया। वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखी और छह वर्ष की सजा को घटाकर पांच वर्ष कर दिया। उन्होंने पहले जेल में बिताई अवधि को समायोजित करने के बाद शेष सजा पूरी की और फरवरी 2016 में रिहा हुए।
इसलिए संजय दत्त को 1993 के मुंबई बम धमाकों का दोषी बताना न्यायिक रिकॉर्ड के अनुरूप नहीं है। उन्हें अवैध हथियार रखने के अपराध में सजा हुई थी, न कि बम विस्फोट करने या उनकी साजिश में दोषी पाए जाने के कारण।
नाना पाटेकर ने संजय दत्त के साथ काम करने से क्यों किया इनकार?
संजय दत्त के खिलाफ चल रहे मामले और उन्हें मिली सजा के दौरान नाना पाटेकर ने कई अवसरों पर उनके साथ काम नहीं करने की बात कही। उनका विरोध केवल किसी दूसरे अभिनेता के प्रति नाराजगी नहीं था। वह मुंबई बम धमाकों में अपने भाई को खो चुके थे और इस घटना से जुड़े किसी भी प्रसंग को लेकर उनकी व्यक्तिगत संवेदनशीलता थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह संजय दत्त को सीधे तौर पर बम धमाकों का जिम्मेदार नहीं ठहरा रहे हैं, लेकिन यदि पूरे घटनाक्रम में उनकी थोड़ी भी भूमिका रही हो तो वह उनके साथ काम नहीं करना चाहेंगे।
नाना पाटेकर का कहना था कि अदालत और सरकार अपने अधिकार क्षेत्र में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन वह स्वयं किसके साथ काम करेंगे और किसके साथ नहीं, इसका फैसला करना उनका व्यक्तिगत अधिकार है। इस प्रकार उन्होंने संजय दत्त के साथ काम न करने को अपने व्यक्तिगत विरोध का माध्यम बनाया। यह विरोध किसी कानूनी निर्णय का विकल्प नहीं था। बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की प्रतिक्रिया थी, जिसने आतंकवादी हिंसा में अपने परिवार का सदस्य खोया था।
इस मामले में नाना पाटेकर ने धर्म और समुदाय के आधार पर किसी तरह के विभाजन का समर्थन भी नहीं किया। उनका तर्क था कि मुंबई बम धमाकों में मरने वाले लोग किसी एक धर्म के नहीं थे। उन हमलों में हिंदू और मुसलमान सहित विभिन्न समुदायों के निर्दोष नागरिकों ने अपनी जान गंवाई थी। इसलिए उनके लिए यह सवाल किसी धार्मिक पहचान का नहीं, बल्कि निर्दोष नागरिकों की मृत्यु और उससे जुड़े नैतिक उत्तरदायित्व का था।
संजय दत्त की पैरोल पर भी उठाए थे सवाल
फरवरी 2014 में संजय दत्त की पैरोल बढ़ाए जाने के मुद्दे पर नाना पाटेकर ने फिर अपना विरोध दर्ज कराया था। उस समय संजय दत्त अवैध हथियार रखने के मामले में सजा काट रहे थे। नाना ने सवाल उठाया था कि किसी व्यक्ति की लोकप्रियता या फिल्मी पहचान के कारण उसे कानून के सामने विशेष सुविधाएं क्यों मिलनी चाहिए। उनका तर्क था कि सामान्य नागरिक और प्रसिद्ध अभिनेता के लिए न्याय तथा जेल प्रशासन के नियमों का व्यवहार समान होना चाहिए। उन्होंने दर्शकों की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि लोग पहले किसी अभिनेता की फिल्में देखकर उसे लोकप्रिय बनाते हैं और बाद में उसी व्यक्ति को मिलने वाली सुविधाओं का विरोध करते हैं। नाना के इस बयान में केवल संजय दत्त के प्रति नाराजगी नहीं, बल्कि फिल्मी लोकप्रियता और नागरिक जिम्मेदारी के बीच संबंध को लेकर भी एक सवाल था।
नाना पाटेकर ने उस समय कहा था कि उन्होंने संजय दत्त के साथ काम नहीं किया है और आगे भी नहीं करेंगे। उन्होंने इसे अपने स्तर पर विरोध जताने का तरीका बताया। वर्ष 2018 में जब संजय दत्त के जीवन पर आधारित फिल्म ‘संजू’ प्रदर्शित हुई, तब भी नाना पाटेकर का यह पुराना साक्षात्कार दोबारा चर्चा में आया। उस समय कुछ समाचार माध्यमों ने उनके बयान को फिर प्रकाशित किया था। नाना का रुख इसलिए भी उल्लेखनीय था क्योंकि वह एक ऐसे अभिनेता के साथ काम न करने की बात कह रहे थे, जो हिंदी फिल्म उद्योग में लंबे समय से सक्रिय और लोकप्रिय था। हालांकि संजय दत्त के प्रति उनके व्यक्तिगत विरोध को अदालत के निष्कर्षों से अलग समझना आवश्यक है।
क्या 2006 में ही दोनों एक फिल्म से जुड़ चुके थे?
नाना पाटेकर और संजय दत्त के बीच पेशेवर संबंधों की चर्चा में वर्ष 2006 की फिल्म ‘टैक्सी नंबर 9211’ का उल्लेख भी मिलता है। इस फिल्म में नाना पाटेकर और जॉन अब्राहम प्रमुख भूमिकाओं में थे, जबकि संजय दत्त का योगदान कथावाचक के रूप में था। इसलिए तकनीकी दृष्टि से दोनों कलाकारों के नाम एक ही फिल्म से जुड़े थे। लेकिन यह किसी साझा अभिनय दृश्य या पर्दे पर साथ दिखाई देने के समान नहीं था। यही अंतर वर्ष 2025 की फिल्म ‘हाउसफुल 5’ के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
नाना पाटेकर ने जब संजय दत्त के साथ काम नहीं करने की बात कही थी, तब उनके बयान का आशय क्या किसी भी फिल्म में दोनों का नाम जुड़ने से था या वह संजय दत्त के साथ प्रत्यक्ष अभिनय करने से इनकार कर रहे थे? उपलब्ध बयानों में इस अंतर की विस्तृत व्याख्या नहीं मिलती।
2025 में आया वह मोड़, जिसने पुराने फैसले पर सवाल खड़े कर दिए
नाना पाटेकर और संजय दत्त के संबंधों की कहानी में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वर्ष 2025 में आया। निर्देशक तरुण मनसुखानी की फिल्म ‘हाउसफुल 5’ में दोनों कलाकारों को लिया गया। इस फिल्म में अक्षय कुमार, रितेश देशमुख, अभिषेक बच्चन, जैकलीन फर्नांडिस, सोनम बाजवा और अन्य कलाकार भी शामिल थे। फिल्म 6 जून 2025 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई। इसके प्रदर्शन से पहले जारी प्रचार सामग्री में नाना पाटेकर और संजय दत्त दोनों की मौजूदगी सामने आई। इसी के साथ फिल्म जगत में एक पुराना सवाल फिर उठ खड़ा हुआ कि वर्षों पहले संजय दत्त के साथ काम न करने का सार्वजनिक फैसला सुनाने वाले नाना पाटेकर आखिर उसी फिल्म का हिस्सा कैसे बन गए?
यह प्रश्न फिल्म की रिलीज से पहले ही चर्चा में आ चुका था। 3 जून, 2025 को ‘लोकसत्ता’:ने इस विषय पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें नाना पाटेकर के पुराने बयान और ‘हाउसफुल 5’ में दोनों कलाकारों की मौजूदगी का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या दोनों ने वास्तव में साथ अभिनय किया है या वे केवल एक ही फिल्म के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई देंगे। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उनके पुराने फैसले और नई फिल्म के बीच का अंतर पहली बार अब सामने आया है। यह प्रश्न फिल्म के प्रदर्शन से पहले भी उठाया जा चुका था।
लेकिन इस घटनाक्रम का एक मानवीय और राजनीतिक-सामाजिक पक्ष भी है। नाना पाटेकर का पुराना फैसला केवल फिल्मी संबंधों तक सीमित नहीं था। उन्होंने इसे 1993 के मुंबई बम धमाकों में मारे गए लोगों के प्रति अपनी भावनाओं से जोड़ा था। ऐसे में एक ही फिल्म में दोनों कलाकारों की मौजूदगी उनके सार्वजनिक रुख में आए संभावित बदलाव को समझने का अवसर देती है। हालांकि केवल किसी फिल्म की कलाकार सूची से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दो व्यक्तियों के बीच निजी मतभेद समाप्त हो गए हैं।
क्या दोनों ने एक-दूसरे के साथ दृश्य भी फिल्माए थे?
यह इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण तथ्यात्मक प्रश्न है। ‘हाउसफुल 5’ में नाना पाटेकर और संजय दत्त दोनों का नाम कलाकारों की सूची में शामिल है। लेकिन दोनों ने एक-दूसरे के साथ कितने दृश्य फिल्माए, क्या उनके बीच प्रत्यक्ष संवाद वाले दृश्य थे और शूटिंग के दौरान उनके व्यक्तिगत संबंध कैसे थे, इन सवालों पर उपलब्ध विश्वसनीय समाचार रिपोर्टों से स्पष्ट और स्वतंत्र रूप से सत्यापित जानकारी नहीं मिलती।
किसी बड़े कलाकार समूह वाली फिल्म में दो अभिनेताओं का शामिल होना और उनका एक-दूसरे के साथ प्रत्यक्ष अभिनय करना अलग-अलग बातें हैं। कई फिल्मों में कलाकार अलग-अलग समय और स्थान पर शूटिंग करते हैं। ऐसे में केवल एक फिल्म में नाम शामिल होने से उनके व्यक्तिगत संबंधों के बारे में कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसी कारण नाना पाटेकर और संजय दत्त के मामले में यह अंतर महत्वपूर्ण है। दोनों का ‘हाउसफुल 5’ का हिस्सा होना स्थापित तथ्य है, लेकिन उनके बीच व्यक्तिगत मेल-मिलाप की पुष्टि इससे नहीं होती।
क्या नाना पाटेकर ने संजय दत्त को माफ कर दिया था?
इस प्रश्न का सीधा उत्तर यह है कि उपलब्ध सार्वजनिक बयानों में नाना पाटेकर की ओर से संजय दत्त को व्यक्तिगत रूप से माफ कर देने की कोई स्पष्ट और प्रमाणित घोषणा सामने नहीं आती। उन्होंने अपने पुराने विरोध को वापस लेने की सार्वजनिक वजह भी विस्तार से नहीं बताई थी। इसी तरह संजय दत्त की ओर से भी इस विशेष प्रसंग पर ऐसा कोई पुष्ट बयान उपलब्ध नहीं है, जिससे यह निश्चित हो सके कि दोनों के बीच पुराने मतभेदों को लेकर कोई बातचीत या समझौता हुआ था।
किसी व्यक्ति को माफ करना एक निजी भावनात्मक निर्णय है, जबकि उसके साथ किसी फिल्म में काम करना एक पेशेवर निर्णय हो सकता है। दोनों का एक-दूसरे से संबंध होना आवश्यक नहीं है। यह संभव है कि समय के साथ किसी व्यक्ति के विचार बदल जाएं। यह भी संभव है कि कोई कलाकार अपनी व्यक्तिगत असहमति बनाए रखते हुए किसी पेशेवर परियोजना का हिस्सा बने। लेकिन ये केवल सामान्य संभावनाएं हैं। नाना पाटेकर ने स्वयं क्या सोचा और किस कारण ‘हाउसफुल 5’ स्वीकार की, इसका प्रमाणित उत्तर उपलब्ध नहीं है। इसलिए उन्हें संजय दत्त को माफ कर देने वाला बताना भी जल्दबाजी होगी और यह दावा करना भी गलत होगा कि वह जीवन के अंत तक उनसे पहले जैसी ही नाराजगी रखते थे।
क्या संजय दत्त के अपने पुराने मामले पर बदले विचार?
इस कहानी का एक दूसरा पहलू संजय दत्त का अपने अतीत के प्रति दृष्टिकोण है। अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक साक्षात्कार संबंधी रिपोर्ट में संजय दत्त ने वर्ष 1993 में अपने घर में अवैध हथियार रखने के निर्णय को अपनी गलती स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि उन गलतियों की जिम्मेदारी उनकी स्वयं की थी। उन्होंने अपने पिता सुनील दत्त और परिवार पर उस घटनाक्रम के भावनात्मक प्रभाव का भी उल्लेख किया।
हालांकि संजय दत्त द्वारा अपने पुराने फैसलों की जिम्मेदारी स्वीकार करना और नाना पाटेकर के साथ उनके संबंधों का बदलना दो अलग विषय हैं। इस बयान को दोनों के बीच सुलह का प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि तीन दशक से अधिक समय बाद भी 1993 का घटनाक्रम संजय दत्त के सार्वजनिक जीवन और उनके अतीत के मूल्यांकन से जुड़ा रहा।
नाना पाटेकर के निधन के बाद फिर उठे पुराने सवाल
8 अक्टूबर 2026 को नाना पाटेकर के निधन के बाद उनके फिल्मी जीवन, सामाजिक कार्यों और पुराने सार्वजनिक बयानों की फिर चर्चा शुरू हुई। इसी क्रम में संजय दत्त के साथ उनके संबंधों का प्रसंग भी सामने आया। उनके निधन के बाद अक्षय कुमार, रितेश देशमुख और फिल्म जगत की अन्य हस्तियों ने उनके अभिनय तथा व्यक्तित्व को याद किया। ‘हाउसफुल 5’ भी उनकी अंतिम दौर की चर्चित फिल्मों में शामिल रही।
नाना पाटेकर के निधन के बाद 1993 के मुंबई बम धमाकों में उनके भाई की मृत्यु और संजय दत्त के प्रति उनके पुराने विरोध का प्रसंग कई समाचार माध्यमों ने दोबारा प्रकाशित किया। लेकिन इस कहानी का महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि उन्होंने संजय दत्त के साथ काम करने से इनकार क्यों किया था। अब सवाल यह भी है कि जिस फैसले को उन्होंने वर्षों तक सार्वजनिक रूप से दोहराया, उसके बाद दोनों कलाकारों के एक ही फिल्म में आने का क्या अर्थ निकाला जाए?
इस प्रश्न का उत्तर तलाशते समय दो अतियों से बचना होगा। पहली, यह दावा करना कि नाना पाटेकर ने संजय दत्त को पूरी तरह माफ कर दिया था। दूसरी, यह मान लेना कि ‘हाउसफुल 5’ में दोनों की मौजूदगी के बावजूद नाना के पुराने विचार बिल्कुल अपरिवर्तित थे। दोनों निष्कर्षों के समर्थन में पर्याप्त सार्वजनिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
व्यक्तिगत पीड़ा, नैतिक विरोध और पेशेवर जीवन के बीच की कहानी
नाना पाटेकर और संजय दत्त की यह कहानी केवल दो फिल्म अभिनेताओं के बीच संबंधों की कहानी नहीं है। इसमें आतंकवादी हिंसा से प्रभावित एक परिवार की पीड़ा, आपराधिक न्याय व्यवस्था, फिल्मी लोकप्रियता, व्यक्तिगत नैतिकता और पेशेवर जीवन के बीच जटिल संबंध दिखाई देते हैं। नाना पाटेकर ने अपने भाई की मृत्यु के बाद संजय दत्त के साथ काम नहीं करने का फैसला किया था। उन्होंने उस फैसले को सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी किया। दूसरी ओर, संजय दत्त ने अवैध हथियार रखने के मामले में अदालत द्वारा निर्धारित सजा पूरी की और बाद में अपने फिल्मी करियर को जारी रखा।
इन दोनों घटनाओं के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। किसी व्यक्ति का अदालत द्वारा निर्धारित दंड पूरा कर लेना उसकी कानूनी स्थिति से संबंधित है, जबकि उससे प्रभावित किसी दूसरे व्यक्ति की भावनाएं निजी अनुभवों से निर्धारित हो सकती हैं। कानून किसी व्यक्ति को उसके अपराध के लिए दंडित कर सकता है, लेकिन उससे प्रभावित लोगों के मन में उत्पन्न पीड़ा या क्षमा की भावना को निर्धारित नहीं कर सकता। इसी तरह व्यक्तिगत असहमति का अर्थ यह भी नहीं है कि दो लोग भविष्य में किसी पेशेवर परियोजना से नहीं जुड़ सकते।
नाना पाटेकर के मामले में एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है। वर्ष 1993 की घटना ने उनके सार्वजनिक बयानों और संजय दत्त के प्रति उनके रुख को प्रभावित किया था। वर्ष 2025 में दोनों कलाकारों का ‘हाउसफुल 5’ का हिस्सा बनना भी एक स्थापित तथ्य है। लेकिन इन दो घटनाओं के बीच व्यक्तिगत संबंधों में क्या बदलाव आया, इसका प्रमाणित विवरण सामने नहीं है।
इसलिए इस कहानी का निष्कर्ष किसी काल्पनिक मेल-मिलाप में नहीं, बल्कि एक अनुत्तरित प्रश्न में छिपा है। जिस अभिनेता ने मुंबई बम धमाकों में अपने भाई को खोने के बाद संजय दत्त के साथ काम नहीं करने का निर्णय लिया था, वह तीन दशक बाद उसी फिल्म का हिस्सा बना जिसमें संजय दत्त भी थे। क्या यह समय के साथ बदले विचारों का परिणाम था, क्या यह पेशेवर परिस्थितियों के कारण लिया गया फैसला था, या इसके पीछे कोई निजी बातचीत हुई थी? इन सवालों का निश्चित उत्तर नाना पाटेकर के किसी प्रमाणित स्पष्टीकरण के बिना नहीं दिया जा सकता।
नाना पाटेकर ने संजय दत्त को माफ कर दिया था या नहीं, यह अब भी स्पष्ट नहीं है। लेकिन उनकी कहानी यह जरूर दिखाती है कि किसी व्यक्ति के सार्वजनिक सिद्धांत, उसके निजी अनुभव और पेशेवर निर्णय हमेशा एक सरल रेखा में नहीं चलते।









