Bihar ropeway collapse: बिहार के पर्यटन को नई ऊंचाई देने का सपना उस वक्त चकनाचूर हो गया, जब रोहतास के ऐतिहासिक कैमूर पहाड़ियों पर बन रहा बहुप्रतीक्षित रोपवे ट्रायल के दौरान ही किसी ताश के महल की तरह भरभराकर गिर पड़ा। जिस रोपवे को नए साल पर जनता को समर्पित किया जाना था, वह उद्घाटन से पहले ही मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। यह मंजर इतना खौफनाक था कि वहां मौजूद इंजीनियरों और मजदूरों के हाथ-पांव फूल गए।
पिलरों के उखड़ने की आवाज इतनी तेज थी कि लगा जैसे पहाड़ियों पर कोई बड़ा धमाका हुआ हो। स्थानीय लोग जो पिछले 6 सालों से इस पल का इंतजार कर रहे थे कि वे हवा में सफर करते हुए रोहतासगढ़ किला देखेंगे, उनकी आंखों के सामने ही करोड़ों की लागत से बना यह ढांचा जमींदोज हो गया। (Bihar ropeway collapse) आखिर 13 करोड़ से ज्यादा की लागत वाला यह प्रोजेक्ट एक झटके में क्यों ढह गया? क्या यह निर्माण की लापरवाही थी या किसी बड़ी अनहोनी की आहट? आइए जानते हैं उस पल की पूरी कहानी जब मौत बनकर गिरा यह लोहे का ढांचा।
Bihar ropeway collapse: जब मौत बनकर गिरा रोपवे का पिलर
यह सनसनीखेज हादसा रोहतास जिले के अकबरपुर इलाके में हुआ। जानकारी के मुताबिक, रोपवे का निर्माण पूरा होने के बाद अभियंताओं और तकनीकी विशेषज्ञों की निगरानी में अंतिम परीक्षण (ट्रायल) किया जा रहा था। (Bihar ropeway collapse) जैसे ही खाली केबिन-डोला को अकबरपुर बेस स्टेशन से रोहतासगढ़ किले की ओर रवाना किया गया, वह कुछ ही दूरी पर पहुंचा था कि अचानक संतुलन बिगड़ गया। देखते ही देखते रोपवे का एक मुख्य पिलर जमीन से उखड़ गया और फिर एक के बाद एक कई पिलर धराशाई होते चले गए। (Bihar ropeway collapse) यात्रियों के बैठने वाली केबिन टूटकर सैकड़ों फीट नीचे पत्थरों पर जा गिरी। गनीमत यह रही कि उस वक्त केबिन खाली था, वरना नए साल की खुशियां मातम में बदल सकती थीं।
6 साल का इंतजार और करोड़ो खाक
रोहतासगढ़ किला तक पहुंचने के लिए सैलानियों को अभी तक 70 किलोमीटर का घुमावदार और लंबा रास्ता तय करना पड़ता था। इसी दूरी को मिनटों में समेटने के लिए साल 2019 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस रोपवे का शिलान्यास किया था। (Bihar ropeway collapse) पिछले 6 सालों से दिन-रात इसका काम चल रहा था और सरकारी खजाने से लगभग 13 करोड़ 65 लाख रुपये इस पर खर्च किए जा चुके थे। नए साल यानी 2026 की शुरुआत में इसका लोकार्पण होना था, जिसे लेकर अकबरपुर के लोगों में भारी उत्साह था। लेकिन इस हादसे ने निर्माण की गुणवत्ता और इंजीनियरिंग पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
कौन है इस बर्बादी का जिम्मेदार?
हवा में झूलते इस सपने के धराशाई होने के बाद इलाके में भारी निराशा और आक्रोश है। लोगों का सवाल है कि जिस रोपवे का ढांचा बिना यात्रियों के बोझ के ही गिर गया, वह भविष्य में लोगों की जान के लिए कितना बड़ा खतरा साबित हो सकता था। (Bihar ropeway collapse) हादसे के बाद अकबरपुर और आसपास के इलाकों में अफरा-तफरी का माहौल है। अब अधिकारी और निर्माण एजेंसी जांच की बात कर रहे हैं, लेकिन 13 करोड़ रुपये की बर्बादी और 6 साल की मेहनत का हिसाब कौन देगा? इस हादसे ने एक बार फिर बिहार में चल रहे बड़े निर्माण कार्यों की पोल खोल दी है।










