Brajesh Pathak: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों का बिगुल बजने से पहले ही राजनीतिक गलियारों में एक नया और बेहद चौंकाने वाला मोड़ आ गया है। एक तरफ जहां तमाम राजनीतिक दल अपनी-अपनी बिसात बिछाने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के अपने ही परिवार में एक बड़ा सियासी विस्फोट हो गया है। डिप्टी सीएम के सगे साले राजीव कुमार त्रिपाठी ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट शेयर करते हुए उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों में भारी खलबली पैदा कर दी है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के बजाय अपनी बहन के घर के मुख्य विरोधी दल यानी समाजवादी पार्टी का हाथ थामने का खुला ऐलान कर दिया है।
Brajesh Pathak: राजीव त्रिपाठी ने स्पष्ट किए अपने तेवर
राजीव कुमार त्रिपाठी ने अपनी चर्चित फेसबुक पोस्ट में रिश्तों की मर्यादा और अपनी अलग राजनीतिक सोच को बेहद साफ शब्दों में सामने रखा है। उन्होंने लिखा कि नम्रता पाठक उनकी सगी बड़ी बहन हैं और उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक उनके आदरणीय जीजा हैं।
हालांकि, उन्होंने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि इस पारिवारिक रिश्ते का उनकी निजी राजनीतिक विचारधारा पर कोई असर नहीं पड़ेगा। राजीव ने अपनी पोस्ट में कहा कि यदि उनके इस अप्रत्याशित फैसले से उनकी बहन या जीजा के मन को कोई ठेस पहुंची है, तो वह अपने उज्ज्वल भविष्य का हवाला देते हुए उनसे अग्रिम रूप से क्षमा मांगते हैं।
2027 में सपा सरकार बनाने की ठानी
अपने भावी राजनीतिक मार्ग को रेखांकित करते हुए राजीव त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि वह समाजवादी पार्टी की नीतियों और समाजवादी विचारधारा से गहराई से प्रभावित हैं। वह किसी भी प्रकार के जातीय समीकरण या जातिवादी सोच से ऊपर उठकर समाज के सभी वर्गों के बीच पार्टी के जनाधार को मजबूत करने का काम करेंगे। उन्होंने दावा किया कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में वह समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनवाने में अपना पूरा योगदान देंगे। राजीव का मानना है कि उत्तर प्रदेश के विकास और खुशहाली के लिए समाजवाद का रास्ता ही सबसे सही विकल्प है।
लखनऊ से दिल्ली तक बढ़ी सियासी तपिश
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के एक इतने बड़े और प्रमुख चेहरे के घर से इस प्रकार की आवाज उठने के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। एक तरफ जहां भाजपा खेमा इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता राजीव त्रिपाठी के इस खुले समर्थन को अपनी वैचारिक जीत के रूप में देख रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले परिवार के भीतर से उठी यह भिन्न राजनीतिक आवाज आने वाले दिनों में और भी कई नए सियासी समीकरणों को जन्म दे सकती है।










