Republic Day: बचपन का रिपब्लिक डे याद है आपको? कितना मजा आता था न, स्कूल में मिठाई मिलती थी, न पढ़ाई होती थी, न होमवर्क चेक होता था. और फिर घर आकर हम लोग दूरदर्शन पर रिपब्लिक डे की परेड और अलग-अलग राज्यों की सुन्दर-सुन्दर झांकियां देखा करते थे. Republic Dayआप में से कइयों के मन में सवाल उस वक्त रहते होंगे, कि कैसे सलेक्ट होती हैं ये झांकियां? ये इक्कीस तोपों की सलामी क्या है? परेड क्यों निकलती है? 26 जनवरी, 2026 को भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. तो इस मौके पर इन सब सवालों के जवाब जान लेते हैं.
Republic Day: 26 जनवरी ही क्यों?
26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान अपना लिया. सालों के संघर्ष के बाद भारत आखिरकार एक स्वतंत्र और फिर गणतंत्र देश बनने जा रहा था. पर संविधान लागू करने के लिए यही दिन क्यों चुना गया? इसकी वजह थी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार से 26 जनवरी 1930 को भारत को डोमिनियन का दर्जा देने की मांग. (Republic Day) बाद में रावी नदी के किनारे तिरंगा फहराकर पूर्व स्वराज का संकल्प लिया गया. इसके बाद से ही 26 जनवरी को पूर्ण स्वाधीनता दिवस मनाने की शुरुआत हुई. आजादी के बाद संविधान लागू होने पर यही तारीख गणतंत्र दिवस बन गई.
परेड क्यों निकाली जाती है?
सीधे तौर पर देखें तो किसी भी तरह की सैन्य परेड का संबंध अपनी ताकत का प्रदर्शन करने से है. इसमें सैनिक क्षमता, हथियार आदि का प्रदर्शन किया जाता है जिससे लोगों में देश के प्रति गर्व की भावना आए. साथ ही दुश्मनों और बाकी देशों को शक्ति का आभास कराने के लिए भी परेड निकाली जाती रही है. (Republic Day) लेकिन परेड निकालने का रिवाज नया नहीं है. इसके तार जुड़ते हैं मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यता से. मेसोपोटामिया के राजा ऐसी परेड निकाला करते थे. इसमें वो मशहूर ‘इश्तार के दरवाजे’ से शहर के अंदर आते थे. रास्ते के दोनों तरफ शेरों के 60 स्टैच्यू लगे होते थे.
कुछ इसी तरह रोमन साम्राज्य के समय वहां के जनरल्स जंग जीतने के बाद परेड निकालते थे. जब वो जीतकर वापस आते थे तब उनके साथ एक सैनिकों का काफिला हुआ करता था. ये काफिला शहर में जहां से भी गुज़रता, सड़क के दोनों तरफ लोग हाथ उठाकर या नारे लगाकर इसका अभिवादन करते. (Republic Day) 19वीं सदी की शुरुआत को देखें तो येे वो समय था जब यूरोप में राष्ट्रवाद की लहर जोर पकड़ रही थी. ऐसे में लोगों में जोश और उत्साह का संचार करने का सबसे प्रभावी जरिया सैन्य परेड्स बन गईं.
मॉडर्न युग की परेड
मॉडर्न युग में यानी आज के जमाने में जो मिलिट्री परेड हम देखते हैं, वो प्राचीन प्रशिया यानी आज के जर्मनी से प्रेरित बताई जाती है. आपने परेड में सैनिकों को पैरों को सामने की तरफ उठाकर कदमताल करते हुए देखा होगा. इस कदम या स्टेप के बिना कोई भी परेड फीकी या अधूरी लग सकती है. (Republic Day) पर कितनी हैरानी होगी जब पता चले की ये स्टेप हिटलर की नाजी आर्मी का है. उस जमाने में इसे गूज स्टेप कहा जाता था.
भारत की सैन्य परेड
भारत में ब्रिटिश राज के दौरान परेड और जुलूस आम बात थी. इसका इस्तेमाल ब्रिटिश न सिर्फ भारतीयों को बल्कि पूरी दुनिया को अपनी ताकत दिखाने के लिए करते थे. खासकर उनके यूरोपियन प्रतिद्वंदियों फ्रांस और पुर्तगाल को दिखाने के लिए. क्योंकि ब्रिटेन के अलावा यही दो देश ऐसे थे जिनके उपनिवेश अलग-अलग जगह फैले थे. (Republic Day) इसीलिए कहते हैं कि जब अंग्रेज भारत से गए तो पूरी तरह से नहीं गए? अंग्रेजों ने भारत को रेलवे दिया पर एक चीज और जो अंग्रेज हमें देकर गए वो थी सैनिक परेड का कल्चर.
1950 से लेकर 1954 तक गणतंत्र दिवस परेड राजपथ पर नहीं हुई थी. ये कभी इरविन स्टेडियम, कभी किंग्सवे कैंप, तो कभी रामलीला मैदान में आयोजित होती थी. 1950 में पहले गणतंत्र दिवस में सिर्फ सैन्य दस्ते की परेड हुई. उस समय राज्यों की झांकियां नहीं निकाली जाती थीं. पहली बार 1953 में सेना के साथ कुछ अन्य सशस्त्र बलों के साथ राज्यों की भी झांकियों को शामिल किया गया. पर इसके पीछे का कारण क्या था?
दरअसल 50 के दशक में भारत के राज्यों के बीच भाषाई आधार पर तनाव बढ़ रहा था. सभी को अपने कल्चर को बचाना था. ऐसे में विभिन्न राज्यों और परंपराओं का होने के बावजूद भी एक साथ राजपथ पर परेड देश की एकता को दर्शाता. (Republic Day) राज्यों के बीच का यही भेद मिटाने के लिए 1953 में पहली बार राज्यों की झांकियों को शामिल किया गया. इसका मकसद राज्यों के बीच एक तालमेल और एक हेल्दी कंपटीशन डेवलप करना था.
झांकियां कैसे चुनी जाती हैं?
रक्षा मंत्रालय के सर्कुलर के मुताबिक मंत्रालय हर बार की परेड के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चुनता है. कितने राज्यों की झांकियां कर्तव्य पथ पर मार्च करेंगी ये मंत्रालय ही तय करता है. इसके सिलेक्शन प्रोसेस में राज्यों को अपनी झांकी का एक कान्सेप्ट और ब्लूप्रिंट भेजना होता है. (Republic Day) आवेदन करने कि आखिरी डेट आमतौर दो महीने पहले यानी नवंबर में रखी जाती है. जितने भी आवेदन रक्षा मंत्रालय को आते हैं उन्हें एक एक्सपर्ट कमिटी देखती है. इस कमेटी में कला, कल्चर, पेंटिंग, संगीत, आर्कीटेक्चर, कोरियोग्राफी जैसे क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल होते हैं.
चीफ गेस्ट कैसे तय किया जाता है?
साल 2026 में गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि के तौर पर यूरोपियन काउंसिल के प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा और यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सला वॉन डर लेयेन भारत आ रहे हैं. इससे पहले 2025 इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबिअंतो गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि थे.
विदेश मंत्रालय की एक रिव्यू टीम होती है जो 6 महीने पहले से इसकी तैयारी शुरू कर देती है. दोनों देशों के बीच कुछ पॉइंट्स देखे जाते हैं. मसलन दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग, कमर्शियल, इकोनॉमिक और पॉलिटिकल कनेक्शन कैसे हैं? फिर विदेश मंत्रालय की टीम ये नाम पीएम को भेजती है. अपने सलाहकारों से मशवरा करने के बाद पीएम ये फाइल राष्ट्रपति को भेज देते हैं. (Republic Day) राष्ट्रपति से मंजूरी मिलते ही गेस्ट से संपर्क कर उनका शेड्यूल तैयार किया जाता है. गेस्ट को रीसीव करने खुद पीएम एयरपोर्ट जाते हैं. यहां से उन्हें राष्ट्रपति भवन ले जाया जाता है जहां उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है. फिर 21 तोपों की सलामी दी जाती है.
परेड की खूबियां
गणतंत्र दिवस समारोह की शुरुआत होती है राष्ट्रपति का काफिला आने से. प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया अपनी स्पेशल कार में होते हैं. इनके आसपास विशेष अंगरक्षक चलते हैं जिन्हें प्रेसिडेंशियल गार्ड्स कहा जाता है जो एक घुड़सवार यूनिट है. तिरंगा फहराने के समय राष्ट्रपति के घुड़सवार अंगरक्षक समेत वहां मौजूद सभी लोग सावधान की मुद्रा में खड़े होकर तिरंगे को सलामी देते हैं. (Republic Day) फिर राष्ट्रगान बजता है. राष्ट्रगान के दौरान 21 तोपों की सलामी दी जाती है. साल 2022 तक पोंडर तोपों से सलामी दी जाती थी. उसके बाद साल 2023 से भारत में बनी मेक इन इंडिया तोपों से पहली बार राष्ट्रपति को सलामी दी गई.
गणतंत्र दिवस की परेड ध्वजारोहण के बाद शुरू हो जाती है. सभी सैनिक और परेड में शामिल होने वाले व्यक्ति, चाहे वो एनसीसी के कैडेट्स हों, या झांकी की व्यवस्था देखने वाले सहायक हों, सब तड़के तीन-चार बजे ही कर्तव्य पथ पर पहुंच जाते हैं. (Republic Day) परेड में शामिल होने के लिए सभी दल सैकड़ों घंटे तक अभ्यास कर चुके होते हैं. जिसकी तैयारी कई महीने पहले शुरू हो जाती है. सर्वश्रेष्ठ परेड की ट्रॉफी देने के लिए पूरे रास्ते में कई जगहों पर जजों को बिठाया जाता है. ये जज हर दल को 200 में से नम्बर देते हैं. इसके आधार पर सर्वश्रेष्ठ मार्चिंग दल का चुनाव होता है. किसी भी दल के लिए इस ट्रॉफी को जीतना बड़े गौरव की बात होती है.
परेड में शामिल सभी झांकियां 5 किमी प्रति घंटा की नीयत रफ्तार से चलती हैं, ताकि उनके बीच उचित दूरी बनी रहे और लोग आसानी से उन्हें देख सकें. ये स्पीड फिक्स होती है. इन झांकियों के चालक एक छोटी सी खिड़की से ही आगे का रास्ता देखते हैं, क्योंकि सामने का लगभग पूरा शीशा सजावट से ढका रहता है. (Republic Day) इस परेड में शामिल सैनिकों का चुनाव भी खास तरीके से किया जाता है. इन सैनिकों को कई महीने पहले ही चुन लिया जाता है. इन्हें मार्चिंग कंटिंजेंट कहा जाता है.
चुने जाने के लिए इन सैनिकों की फिजिकल फिटनेस और कठिन परिस्थितियों को सहने की क्षमता को देखा जाता है. सबसे बेस्ट जवानों को ही परेड करने में मौका मिल पाता है. आर्मी की तमाम रेजीमेंट्स के अलावा नेवी और एयरफोर्स भी मार्च करते हैं. (Republic Day) साथ ही अन्य केन्द्रीय बल जैसे CRPF, CISF और NSG जैसे बल भी इस परेड का हिस्सा होते हैं. दिल्ली पुलिस देश कि एकमात्र ऐसी पुलिस है जो इस परेड में हिस्सा लेती है.















