Yashwant Sinha: पिछले कई सालों से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के सबसे मुखर और कड़े आलोचकों में शुमार रहे भारतीय जनता पार्टी के पूर्व वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के तेवर अचानक बदले नजर आए हैं। लंबे समय के लंबे इंतजार के बाद उन्होंने केंद्र सरकार की विदेश नीति और कूटनीतिक कामयाबी की खुलकर तारीफ की है। देश के पूर्व वित्त और विदेश मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के सफल आयोजन पर खुशी जताते हुए भारत की अग्रणी भूमिका को बेहद सराहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत ने चीन के सामने अपने तमाम हितों को पूरी मजबूती के साथ रखा, जिसकी वजह से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के असहज होने की खबरें सामने आईं।
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Yashwant Sinha: BJP से बगावत से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक का सियासी सफर
गौरतलब है कि पूर्व प्रशासनिक अधिकारी (IAS) रहे यशवंत सिन्हा कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सबसे ताकतवर मंत्रियों में गिने जाते थे। हालांकि, 2014 के बाद केंद्र सरकार के कामकाज और नीतियों से भारी नाराजगी के चलते उन्होंने अप्रैल 2018 में भाजपा को अलविदा कह दिया था। इसके बाद उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (TMC) का दामन थामा, लेकिन विपक्षी गोलबंदी का हवाला देकर 2021 में ममता बनर्जी की पार्टी से भी अलग हो गए। साल 2022 में वह पूरे विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़े, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। लगातार मोदी सरकार पर हमलावर रहने वाले सिन्हा का अब सरकार के समर्थन में आना सियासी गलियारों में काफी चर्चा का विषय बना हुआ है।
यशवंत सिन्हा ने गिनाईं ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता की 3 बड़ी वजहें
समाचार एजेंसी एएनआई से खास बातचीत में पूर्व विदेश मंत्री ने दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन को ऐतिहासिक रूप से सफल बताते हुए इसके तीन मुख्य कारण बताए:
तमाम राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति: उन्होंने कहा कि पहली बड़ी सफलता यह रही कि भारत के निमंत्रण पर दुनिया के सभी प्रमुख नेता यहां पहुंचे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आए और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, जिनकी आने पर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे, वे भी शामिल हुए।
सर्वसम्मति से साझा घोषणापत्र: उन्होंने बताया कि इससे पहले जब मई में विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी, तब आपसी मतभेदों के कारण कोई साझा बयान जारी नहीं हो सका था। लेकिन इस बार भारतीय अधिकारियों की कड़ी मेहनत के चलते सर्वसम्मति से साझा घोषणापत्र जारी होना बहुत बड़ी कामयाबी है।
महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बातचीत: सम्मेलन के दौरान सभी प्रमुख देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें हुईं, जिनमें सबसे खास बातचीत भारत और चीन के बीच रही।
चीन के सामने नहीं झुका भारत, तल्खी के बीच उठाई आवाज
चीन के प्रति अपना कड़ा रुख कायम रखते हुए यशवंत सिन्हा ने कहा कि चीन पर कभी भी आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसने हमेशा भारत की पीठ में खंजर घोंपा है। हालांकि, उन्होंने तारीफ करते हुए कहा कि द्विपक्षीय वार्ता में भारत ने अपने सभी लंबित और कड़े मुद्दों को बेहद मजबूती से रखा। भारत के इस सख्त रुख से चीन के राष्ट्रपति काफी नाराज और तल्ख नजर आए। उन्होंने कहा कि ऐसी चर्चाएं हैं कि शी जिनपिंग का रात्रिभोज (डिनर) में शामिल न होना इसी नाराजगी का नतीजा था, जो दिखाता है कि भारत ने अपनी बात बिना दबे रखी है।
ईरान और मध्य पूर्व पर भारत के पुराने स्टैंड की वापसी पर जताया संतोष
पूर्व विदेश मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर मध्य पूर्व और ईरान को लेकर भारत के रुख की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि इजराइल और अमेरिका के तनाव के बीच ऐसा लग रहा था कि भारत अपनी परंपरागत विदेश नीति से थोड़ा अलग हट रहा है। लेकिन इस सम्मेलन के जरिए भारत ने पुनः अपनी संतुलित और ऐतिहासिक नीति पर वापसी की है। घोषणापत्र में गाजा और लेबनान में हो रही हिंसा की आलोचना होना और ईरान की प्रभावी भागीदारी भारत के संतुलित और परिपक्व कूटनीतिक दृष्टिकोण का प्रमाण है। सिन्हा ने कहा कि भारत ने अपनी अध्यक्षता में इस महाआयोजन को जिस निपुणता से संभाला है, वह बेहद सराहनीय है।









