आरके सिन्हा: माता वैष्णो देवी मंदिर परिसर में हुए दिल-दहलाने वाले हादसे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हम भीड़ वाले स्थलों में भीड़ का नियंत्रण करना नहीं सीख पाए हैं। अगर हमने पहले के हादसों से सीख ली होती तो शायद फिर से इतने भीषण हादसे को देखना न पड़ता, लेकिन हमने तो मानो सीखना ही छोड़ दिया है। कहते हैं कि माता वैष्णो देवी के दरबार में माथा टेकने पहुंचे श्रद्धालुओं के बीच किसी बात को विवाद हुआ और फिर उनके बीच मची भगदड़ ने भयानक रूप ले लिया। इसमें 12 तीर्थयात्रियों की मौत हो गई और करीब 16 लोग घायल हो गए। इस घटना से नववर्ष के पहले ही दिन देश में शोक का माहौल व्याप्त हो गया। सवाल उठता है कि क्या स्थानीय प्रशासन को पता नहीं था कि माता वैष्णो देवी के मंदिर में हर साल नववर्ष की रात को भक्तों की भारी भीड़ जुटती है और इसके चलते वहां अव्यवस्था फैल सकती है? लगता है इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया। आखिर कैसे इतने सारे लोगों को एक साथ ऊपर मंदिर में जाने की अनुमति दे दी गईवैष्णो देवी परिसर में हुए हादसे के बाद हमें उन सभी धार्मिक स्थानों और सांस्कृतिक आयोजनों में भीड़ का उचित प्रबंधन करना सख्ती से सीखना होगा, जहां पर भारी भीड़ जुटती है। इसी के साथ यह भी देखना होगा कि किसी मेले या धार्मिक अथवा सांस्कृतिक स्थान पर खास तिथियों में ज्यादा भीड़ जमा न हो जाए, क्योंकि भीड़ के किसी एक जगह जमा होते ही भगदड़ की आशंका बन जाती है। भीड़ निकासी की हमेशा बेहतर और वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए। यह भी व्यवस्था होनी चाहिए कि कहीं पर भी जरूरत से ज्यादा लोग एकत्रित न होने पाएं। इसी के साथ इन जगहों पर जाने वालों को भी सतर्क होना पड़ेगा। खास मौकों पर भक्तों को भीड़भाड़ वाले इलाकों से बचना चाहिए। वे अपनी लापरवाहियों की सारी जिम्मेदारी प्रशासन पर ही नहीं डाल सकते। धार्मिक स्थलों पर तो कहीं अधिक संयम और अनुशासन का परिचय दिया जाना चाहिए। जब ओमिक्रोन का खतरा देश पर मंडरा रहा है, तब इतने सारे भक्त वैष्णो देवी मंदिर में पहुंचना भी समझ से परे है। इ
धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों में भीड़ के बेकाबू होने के कारण भारत में हादसे होते ही रहते हैं। एक अनुमान के अनुसार बीते दस साल में ऐसे स्थलों में भगदड़ के कारण हुए हादसों में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। ऐसे हादसे दुनिया के अन्य देशों में भी होते हैं। कुछेक साल पहले मक्का में भी भगदड़ हो जाने के कारण एक दुखद हादसा हुआ था। अगर हम कुछ दशक पहले जाएं तो 1954 में प्रयागराज में कुंभ मेले में भारी भगदड़ मची थी। उसमें सैकड़ों लोगों की जान गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के स्नान के लिए रोकी गई भीड़ में मची भगदड़ के कारण दुर्घटना हुई
वैष्णो देवी मंदिर की घटना के बारे में श्रइन बोर्ड की ओर से कहा जा रहा है कि कुछ लोगों के बीच बहस हुई और उसके कारण धक्का-मुक्की की स्थिति पैदा हो गई। इसके बाद लोग भागने लगे, जिसके चलते यह हादसा हुआ। सवाल है कि इस झगड़े को बेकाबू को होने से रोकने के लिए तत्काल कदम क्यों नहीं उठाए जा सके? पता नहीं सच क्या है, लेकिन दुर्भाग्यवश कुछ लोग धार्मिक स्थलों की मर्यादा की अनदेखी करते हुए वहां अनुशासनहीनता का परिचय देने लगते हैं। यह ठीक है कि श्रइन बोर्ड ने दावा किया कि पुलिस और प्रशासन ने जल्द ही व्यवस्था बहाल कर ली, मगर तब तक नुकसान हो चुका था। वह यह नहीं बता सका कि उसने स्थिति को बिगड़ने कैसे दिया? वैष्णो देवी मंदिर का प्रबंधन देखने वाले अफसरों से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने 31 दिसंबर के लिए क्या तैयारियां की थीं? उन अफसरों पर चाबुक चले जो दायित्वों का निर्वाह नहीं कर सके।
पिछले प्रयाग कुंभ के समय उत्तर प्रदेश सरकार ने मेले में तैनात होने वाले पुलिसकर्मियों को नेशनल सिक्योरिटी गार्डस यानी एनएसजी से ट्रेनिंग दिलवाई थी। ये प्रशिक्षित जवान भीड़ में ही शामिल रहते थे और पलक झपकते ही अव्यवस्था और अनुशासनहीन लोगों पर नियंत्रण करने में सक्षम होते थे। कुछ इसी तरह की व्यवस्था वैष्णो देवी मंदिर परिसर और अन्य धार्मिक स्थलों पर भी होनी चाहिए। याद रखें कि धार्मिक स्थानों पर किसी नेता, अभिनेता के आने से भी भगदड़ के हालात पैदा हो जाते हैं। भीड़ उग्र और बेकाबू हो जाती है। इसलिए प्रशासन को बहुत समझदारी से काम करना होता है।
नववर्ष के पहले दिन वैष्णो देवी मंदिर में हुए हादसे की बात करते हुए मुङो यह भी कहने दें कि यह बेहद चिंतनीय विषय है कि हमारे देश में धार्मिक स्थानों और पूजा समारोहों के दौरान नदी और तालाबों में नहाने या फिर मूर्ति विसर्जन करने के क्रम में भी दर्जनों लोग डूबकर जान से हाथ धो बैठते हैं। कुछ साल पहले अकेले बिहार में छठ पूजा के दौरान डूबने से 73 लोगों की जान चली गई थी। इसी तरह दिल्ली में दुर्गा पूजा के विसर्जन के दौरान करीब 10 लोग डूब गए थे। ये सभी दिल दहलाने वाली घटनाएं थीं। ये घटनाएं उन सरकारी दावों-वादों की पोल खोलती हैं कि सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम कर लिए गए हैं। यह भी अफसोस की बात है कि भगदड़ के कारण होने वाली घटनाओं की जांच तो होती है, लेकिन उनके आधार पर क्या कार्रवाई हुई, यह मुश्किल से ही पता चलता है। लगता है कि हादसों की तरह उनसे संबंधित जांच रपटों को भी भुला दिया जाता है। माता वैष्णो देवी मंदिर परिसर जैसी घटनाएं तभी रुकेंगी, जब हमारे प्रशासन की तैयारियां ठोस होंगी। वरना तो कुछ दिनों के शोर तथा मृतकों और घायलों के परिवार वालों को मुआवजा देने के बाद फिर से पहले की तरह सब कुछ चलने लगेगा।










