Akhilesh Yadav PDA Yatra: उत्तर प्रदेश की राजनीति में रथ कभी सिर्फ रथ नहीं होता। उसके पहिए सड़क पर घूमते हैं, लेकिन नजर वोटों पर रहती है। रूट नक्शे पर बनता है, मगर उसका राजनीतिक संदेश लखनऊ से दिल्ली तक पढ़ा जाता है। अब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के PDA रथ को ही देख लीजिए।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव 24 सितंबर को रथ लेकर रायबरेली पहुंच रहे हैं। वही रायबरेली, जहां से लोकसभा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी सांसद हैं। वही रायबरेली, जिसे कांग्रेस अपने सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक गढ़ों में गिनती रही है। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है PDA की यात्रा शुरू करने के लिए अखिलेश को राहुल गांधी का रायबरेली ही क्यों पसंद आया? जवाब शायद रायबरेली की पांच विधानसभा सीटों में छिपा है।
लोकसभा की नेमप्लेट भले कांग्रेस के नाम है लेकिन विधानसभा का हिसाब खोलेंगे तो समाजवादी पार्टी के पास भी दिखाने के लिए मजबूत नंबर हैं। यानी रायबरेली में मामला कुछ ऐसा है सांसद कांग्रेस का, विधानसभा में मजबूत मौजूदगी सपा की और नजर 2027 के बंटवारे पर। यही वह गणित है जो इस रथ के पहियों को राजनीतिक रूप से ज्यादा दिलचस्प बनाता है।
Akhilesh Yadav PDA Yatra: पहले समझिए रायबरेली की इन 5 सीटों का गणित
रायबरेली लोकसभा क्षेत्र के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं बछरावां, हरचंदपुर, रायबरेली सदर, सरेनी और ऊंचाहार। 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद इस इलाके में समाजवादी पार्टी का प्रभाव स्पष्ट दिखा था। मौजूदा राजनीतिक स्थिति में बछरावां, हरचंदपुर और सरेनी में सपा के विधायक हैं, जबकि रायबरेली और ऊंचाहार को BJP के खाते में गिना जा रहा है।
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यही पांच सीटें 2027 की सीट-शेयरिंग की बातचीत में दिलचस्प हो सकती हैं। क्योंकि कांग्रेस कह सकती है सांसद हमारा। सपा के पास जवाब हो सकता है लेकिन विधायक हमारे ज्यादा। और राजनीति में दोस्ती अपनी जगह होती है, सीटों का हिसाब अपनी जगह।
फिलहाल दोनों दलों ने इस यात्रा को सीट-बंटवारे की औपचारिक कवायद नहीं बताया है। सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी के मुताबिक 24 सितंबर के कार्यक्रम की तात्कालिक पृष्ठभूमि पार्टी की छात्र सभा से जुड़े नेताओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और प्रशासन की प्रतिक्रिया है। पार्टी का कहना है कि PDA यात्रा का औपचारिक लॉन्च बाद में होगा। मगर चुनावी मौसम में संयोग भी इतने राजनीतिक होते हैं कि उन पर चर्चा अपने आप शुरू हो जाती है।
2024 में राहुल ने यहीं से बनाई थी 3.90 लाख की बढ़त
अब 2024 का लोकसभा परिणाम उठाइए। राहुल गांधी को रायबरेली में 6,87,649 वोट मिले थे। उन्होंने BJP के दिनेश प्रताप सिंह को 3,90,030 वोट के अंतर से हराया था। यानी लोकसभा के स्तर पर रायबरेली में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद मजबूत रहा।
लेकिन उस जीत को सिर्फ कांग्रेस के संगठन का परिणाम मानना भी पूरी कहानी नहीं होगी। 2024 में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी गठबंधन में चुनाव लड़ रहे थे। उत्तर प्रदेश में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीती थीं। इसलिए रायबरेली में राहुल गांधी की बड़ी जीत के पीछे INDIA गठबंधन के साझा वोट और स्थानीय राजनीतिक समीकरण की भूमिका पर भी चर्चा होती रही है।
यहीं से 2027 का सवाल निकलता है। लोकसभा में सपा ने कांग्रेस प्रत्याशी का साथ दिया। विधानसभा में जब टिकट बांटने की बारी आएगी तो कांग्रेस और सपा अपनी-अपनी जमीन का हिसाब किस तराजू पर रखेंगे?
राहुल की सीट पर अखिलेश का PDA, संदेश किसके लिए?
अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों को केंद्र में रखता है। सपा इसे 2027 की अपनी प्रमुख राजनीतिक रणनीतियों में शामिल कर रही है। ऐसे में PDA रथ का रायबरेली पहुंचना BJP के खिलाफ चुनावी अभियान का हिस्सा तो है ही, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस-सपा के आगामी सीट-बंटवारे के संदर्भ में भी पढ़ा जा रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी रिपोर्ट किया है कि दोनों सहयोगियों के बीच जल्द सीट-शेयरिंग वार्ता शुरू होने की उम्मीद है और रायबरेली में सपा के मौजूदा विधायकों की संख्या उसके दावे का आधार बन सकती है।
2024 में नारा था साथ-साथ। 2027 में सवाल होगा साथ तो ठीक है, लेकिन सीट कितनी-कितनी? गठबंधन की असली परीक्षा अक्सर मंच साझा करने में नहीं, टिकट बांटने की मेज पर होती है।
कांग्रेस के लिए रायबरेली सिर्फ नक्शे पर एक सीट नहीं
कांग्रेस के लिए रायबरेली की अहमियत समझना भी जरूरी है। यह सीट लंबे समय तक सोनिया गांधी के पास रही। 2024 में राहुल गांधी ने यहां से चुनाव लड़ा और बड़ी जीत दर्ज की। बाद में उन्होंने वायनाड सीट छोड़कर रायबरेली को अपने पास रखने का फैसला किया। यानी कांग्रेस ने खुद राजनीतिक रूप से यह संकेत दिया कि उत्तर प्रदेश में रायबरेली उसके लिए खास महत्व रखती है।
अब कल्पना कीजिए सीट-बंटवारे की मेज। कांग्रेस के सामने राहुल गांधी की लोकसभा सीट। सपा के सामने अपने तीन मौजूदा विधायक। दोनों के पास अपना-अपना कागज। और बीच में 2027 की 403 सीटों वाला उत्तर प्रदेश। यहीं गठबंधन की राजनीति में कैलकुलेटर की बैटरी जल्दी खत्म होती है।
सपा क्यों दिखाना चाहेगी अपनी विधानसभा ताकत?
2022 के विधानसभा चुनाव में पूरे उत्तर प्रदेश में सपा ने 111 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी। लेकिन 2024 में दोनों साथ आए और लोकसभा चुनाव का परिणाम उनके लिए 2022 से अलग राजनीतिक परिस्थिति लेकर आया।
अब 2027 में कांग्रेस स्वाभाविक रूप से 2024 के प्रदर्शन के आधार पर अधिक विधानसभा सीटों पर दावा कर सकती है। दूसरी तरफ सपा के पास यह तर्क होगा कि विधानसभा चुनाव में उसका संगठन, विधायक और पिछला प्रदर्शन कांग्रेस से कहीं बड़ा रहा है।
रायबरेली इसी संभावित बहस का छोटा मॉडल बन जाती है। कांग्रेस के पास लोकसभा सांसद हैं। सपा के पास इलाके में कई विधानसभा विधायक हैं। यानी दोनों पार्टियों के पास दावा करने के लिए अलग-अलग आंकड़े हैं।
BJP भी रायबरेली का हिसाब पढ़ रही है
यह कहानी केवल सपा और कांग्रेस की नहीं है। BJP भी रायबरेली को 2027 के लिहाज से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मान रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अगस्त 2026 में रायबरेली पहुंचे थे और बछरावां, हरचंदपुर तथा रायबरेली विधानसभा क्षेत्रों से जुड़ी करीब 879 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया था। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे उन क्षेत्रों में BJP की सक्रियता के संदर्भ में रखा जहां विपक्ष ने 2024 में अच्छा प्रदर्शन किया था।
मतलब तस्वीर दिलचस्प है। राहुल गांधी सांसद हैं। अखिलेश PDA रथ लेकर पहुंच रहे हैं। योगी विकास परियोजनाओं के साथ पहले ही मैदान में उतर चुके हैं। और चुनाव अभी 2027 में है। रायबरेली की सड़कें फिलहाल विकास और यात्राओं दोनों का वजन उठा रही हैं।
बछरावां से शुरुआत भी यूं ही नहीं
अखिलेश का कार्यक्रम बछरावां से शुरू होना है। यहां से वह रथ पर सवार होकर जिले का दौरा करेंगे। सपा के मुताबिक इस कार्यक्रम की पृष्ठभूमि हरचंदपुर के विधायक राहुल लोधी और पार्टी की छात्र सभा से जुड़े घटनाक्रम से जुड़ी है। अखिलेश ने विधायक के घर चाय पीने की बात भी कही थी।
लेकिन राजनीति में चाय का इतिहास भी कम राजनीतिक नहीं रहा है। इस बार चाय हरचंदपुर में होगी, रथ रायबरेली में चलेगा और चर्चा पूरे उत्तर प्रदेश के गठबंधन गणित की होगी।
असली पेंच कांग्रेस-SP की सीट शेयरिंग में है
2024 में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में BJP को बड़ी चुनौती दी। लेकिन लोकसभा का गठबंधन विधानसभा में हूबहू उतर जाएगा, यह मान लेना जल्दबाजी होगी। 403 विधानसभा सीटों में हिस्सेदारी तय करना कहीं ज्यादा जटिल होगा। कांग्रेस 2024 के लोकसभा प्रदर्शन का हवाला दे सकती है। सपा 2022 के विधानसभा प्रदर्शन, मौजूदा विधायकों और अपने संगठनात्मक ढांचे का।
रायबरेली में यही टकराते हुए आंकड़े सबसे साफ दिखाई देते हैं। राहुल गांधी की बड़ी लोकसभा जीत कांग्रेस के पास मजबूत राजनीतिक तर्क है। वहीं पांच विधानसभा क्षेत्रों में सपा की मौजूदा मौजूदगी उसके पास अपना दावा रखने का आधार देती है। इसीलिए अखिलेश का रायबरेली कार्यक्रम सीट-बंटवारे की औपचारिक घोषणा न होते हुए भी उस बहस को हवा दे रहा है।
PDA का दूसरा टेस्ट दलित और पिछड़ा वोट
अखिलेश यादव की रणनीति का दूसरा पहलू और बड़ा है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से अपने सामाजिक आधार को पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पार्टी PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समूहों को व्यापक राजनीतिक छतरी के नीचे जोड़ने की रणनीति पेश कर रही है।
रायबरेली इस प्रयोग के लिए सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण इलाका है। बछरावां अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में भी पिछड़े, दलित, मुस्लिम और सवर्ण समुदाय अलग-अलग अनुपात में चुनावी रणनीति का हिस्सा बनते हैं। हालांकि जातिवार आधिकारिक मतदाता आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण किसी समुदाय का निश्चित प्रतिशत बताना उचित नहीं होगा। 2027 में असली परीक्षा यह होगी कि PDA का नारा बूथ पर कितने व्यापक सामाजिक गठजोड़ में बदलता है।
दोस्ती भी रहे और जमीन भी न जाए, यही असली चुनौती
सपा और कांग्रेस के सामने 2027 की शायद सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहेली यही है। एक-दूसरे के बिना 2024 जैसा विपक्षी तालमेल मुश्किल हो सकता है। लेकिन एक-दूसरे के लिए अपनी मजबूत विधानसभा सीटें छोड़ना भी आसान नहीं होगा। रायबरेली में यह विरोधाभास बिल्कुल सामने खड़ा है। कांग्रेस कह सकती है हमारे सबसे बड़े नेता यहां से सांसद हैं। सपा कह सकती है हमारे विधायक जमीन पर मौजूद हैं। और BJP चाहेगी कि सहयोगियों के बीच सीटों का यही जोड़-घटाव उसके लिए राजनीतिक अवसर पैदा करे।
कौन-सा दल कितना सफल होगा, यह अभी तय नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि सीट-बंटवारे की बातचीत में रायबरेली केवल पांच सीटों का मामला नहीं रहेगी, यह दोनों विपक्षी दल अपने-अपने राजनीतिक वजन को किस आधार पर मापते हैं, उसका भी संकेत दे सकती है।
तो अखिलेश ने रायबरेली ही क्यों चुना?
सपा ने कार्यक्रम के लिए तत्काल कारण छात्र सभा से जुड़े विवाद और हरचंदपुर विधायक से मुलाकात को बताया है और पार्टी ने इसे सीट-शेयरिंग से जोड़ने से इनकार किया है। फिर भी राजनीतिक संदर्भ में तीन तथ्य एक साथ खड़े हैं। रायबरेली राहुल गांधी की लोकसभा सीट है। यहां सपा के तीन मौजूदा विधायक हैं। और 2027 से पहले सपा-कांग्रेस को विधानसभा सीटों का बंटवारा करना है। इसलिए PDA रथ की यह यात्रा सिर्फ किलोमीटर में नहीं नापी जाएगी। इसे सीटों में भी पढ़ा जाएगा।
और शायद रायबरेली से निकलने वाला सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि 2024 में राहुल और अखिलेश साथ मिलकर वोट मांग रहे थे। 2027 में भी साथ रहे तो रायबरेली की पांच सीटों में टिकट किसके हिस्से कितने आएंगे? फिलहाल रथ चल पड़ा है। गठबंधन भी कायम है। लेकिन राजनीति जानती है रथ का रास्ता तय करना आसान है, गठबंधन में सीटों का रास्ता निकालना थोड़ा मुश्किल।









