US-Iran Ceasefire: दुनिया इस वक्त उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ एक छोटी सी चिंगारी भी महाविनाश की आग लगा सकती है। पिछले कुछ दिनों में जो हुआ, उसने न केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की चूलें हिला दी हैं, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान से सफेद झूठ बोला? एक तरफ शांति की दुहाई दी जा रही थी, तो दूसरी तरफ आसमान से मौत बरस रही थी। यह खबर महज एक युद्ध की रिपोर्ट नहीं है, बल्कि उस धोखे की कहानी है जिसने खाड़ी देशों से लेकर अमेरिका तक हड़कंप मचा दिया है।
सब कुछ शुरू हुआ मंगलवार को, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक बड़ा और चौंकाने वाला ऐलान किया। (US-Iran Ceasefire) उन्होंने पूरी दुनिया को बताया कि पाकिस्तान की पहल पर अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का ऐतिहासिक युद्धविराम हो गया है। शहबाज शरीफ का दावा था कि अमेरिका, ईरान और उनके तमाम सहयोगी, जिनमें लेबनान भी शामिल है, तत्काल प्रभाव से जंग रोकने पर सहमत हो गए हैं। इस खबर ने दुनिया को राहत की सांस लेने पर मजबूर किया ही था कि कुछ ही घंटों बाद जो हुआ, उसने शहबाज शरीफ के दावों की धज्जियां उड़ा दीं।
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जैसे ही शहबाज शरीफ का बयान थमा, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक ऐसा बयान जारी किया जिसने पाकिस्तान को पूरी दुनिया के सामने कटघरे में खड़ा कर दिया। (US-Iran Ceasefire) नेतन्याहू ने साफ कहा कि इजरायल डोनाल्ड ट्रंप के उन प्रयासों का तो समर्थन करता है जो ईरान के परमाणु और मिसाइल खतरे को रोकने के लिए हैं, लेकिन यह युद्धविराम लेबनान पर लागू नहीं होता। यानी, पाकिस्तान जिस शांति का ढिंढोरा पीट रहा था, उसकी हकीकत इजरायल की नजर में कुछ और ही थी।
US-Iran Ceasefire: 10 मिनट, 100 ठिकाने और 160 बम: लेबनान में कयामत की रात
युद्धविराम के दावों के बीच बुधवार को इजरायल ने वो किया जिसकी कल्पना शायद ईरान ने नहीं की थी। इजरायली वायुसेना ने लेबनान पर अब तक का सबसे भीषण हमला बोल दिया। महज 10 मिनट के भीतर लेबनान के 100 से अधिक ठिकानों पर 160 से ज्यादा बम गिराए गए। (US-Iran Ceasefire) चारों तरफ सिर्फ धुआं, चीखें और मलबे के ढेर नजर आने लगे। रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो 1982 के बाद लेबनान पर यह सबसे घातक हमला था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस खौफनाक हमले में अब तक 254 बेगुनाह लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और 1165 से ज्यादा लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं।
इजरायली सेना (IDF) के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर ने साफ कर दिया कि हिजबुल्लाह के खिलाफ यह कोई आखिरी हमला नहीं है। उन्होंने दो टूक कहा कि वे उत्तरी क्षेत्र के निवासियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेंगे और हमले बिना रुके जारी रहेंगे। (US-Iran Ceasefire) उधर, ईरान के आईआरजीसी (IRGC) ने इस हमले को युद्धविराम का सीधा उल्लंघन करार दिया है। ईरान का कहना है कि लेबनान पर हमला करके इजरायल ने आग से खेलने का काम किया है और अब ईरान किसी भी वक्त इजरायल पर जवाबी कार्रवाई कर सकता है।
ट्रंप का वो फोन कॉल और नेतान्याहू की गुप्त मीटिंग
इस पूरी कहानी के पीछे की असली साजिश 5 अप्रैल को ही रची जा चुकी थी। बेंजामिन नेतन्याहू ने डोनाल्ड ट्रंप को फोन किया था और उनसे अनुरोध किया था कि इस वक्त युद्धविराम करना ठीक नहीं होगा। हालांकि, ट्रंप अपनी बात पर अड़े रहे। इसके बाद रविवार की रात नेतन्याहू ने अपनी कैबिनेट की एक सीक्रेट मीटिंग बुलाई। (US-Iran Ceasefire) इस मीटिंग में उन्होंने साफ लफ्जों में कह दिया था कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होता भी है, तो इजरायल लेबनान में हिजबुल्लाह को नहीं बख्शेगा।
यही कारण है कि बुधवार को जो बमबारी हुई, वह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि उसकी तैयारी रविवार को ही हो चुकी थी। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर इजरायल ने रविवार को ही हमले की तैयारी कर ली थी, तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ मंगलवार को दुनिया से क्यों कह रहे थे कि सब कुछ शांत हो गया है? क्या उन्होंने जानबूझकर ईरान को अंधेरे में रखा या फिर पाकिस्तान खुद इस खेल का मोहरा बन गया?
ईरान का पलटवार: खाड़ी देशों में मचा हड़कंप
ईरान ने भी इस धोखे का जवाब खामोशी से नहीं दिया। जैसे ही ईरान के तेल केंद्रों पर हमले की खबरें आईं, भले ही इजरायल ने इससे पल्ला झाड़ लिया, लेकिन ईरान की सेना ने अपनी मिसाइलों का रुख सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की तरफ कर दिया। ईरान ने इन देशों पर हमला करके यह संदेश देने की कोशिश की है कि अगर उसकी सुरक्षा से खिलवाड़ हुआ, तो पूरा मिडिल-ईस्ट इस आग में झुलसेगा।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर से फोन पर बात की है। लेबनान पर हुए हमले ने ईरान के भरोसे को तोड़ दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुक्रवार को इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान की बैठक से पहले यह हमला पूरी बातचीत को बेपटरी कर सकता है। ईरान अब यह सोचने पर मजबूर है कि क्या बातचीत की मेज पर बैठना महज एक छलावा है?
मध्यस्थता का खौफनाक इतिहास: कतर-ओमान के साथ क्या हुआ?
पाकिस्तान के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि इतिहास गवाह है कि जिसने भी अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बीच-बचाव करने की कोशिश की, उसे सिर्फ असफलता और बदनामी मिली। पिछले साल जून में कतर ने अमेरिका के कहने पर युद्धविराम करवाया था, लेकिन तीन महीने बाद ही इजरायल ने कतर की राजधानी दोहा पर मिसाइल दाग दी।
यही हाल ओमान के साथ हुआ। फरवरी में ओमान ने महीनों की मेहनत के बाद अमेरिका और ईरान को बातचीत के करीब लाया था, लेकिन आखिरी वक्त पर हमलों ने सब बर्बाद कर दिया। ओमान ने इसे ‘धोखा’ करार दिया था। ईरान अब पाकिस्तान को भी उसी नजर से देख रहा है। ईरान का मानना है कि उसे पहले भी दो बार बातचीत के नाम पर धोखा दिया जा चुका है और इस बार भी पाकिस्तान की पहल के बीच इजरायली बमबारी उसी धोखे की पुनरावृत्ति है।
क्या पाकिस्तान बन पाएगा शांतिदूत?
सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि पाकिस्तान और इजरायल के बीच कोई राजनयिक संबंध नहीं हैं। पाकिस्तान जो भी समझौता करवा रहा है, वह अमेरिका के जरिए है। इजरायल पर पाकिस्तान का कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में अगर इजरायल अमेरिकी समझौते को ठेंगा दिखा देता है, तो पाकिस्तान के पास ईरान को देने के लिए कोई जवाब नहीं होगा।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने इजरायल पर आरोप लगाया है कि वह इस्लामाबाद की शांति पहल को जानबूझकर बिगाड़ रहा है। लेकिन सवाल फिर वही है अगर इजरायल आपकी बात नहीं सुनता, तो आप किस आधार पर ईरान को गारंटी दे रहे थे? अगर आने वाले घंटों में इजरायल दोबारा हमला करता है, तो पाकिस्तान की ‘शांतिदूत’ वाली छवि मिट्टी में मिल जाएगी और ईरान इसे अपनी पीठ में छुरा घोंपने जैसा मानेगा।
अब पूरी दुनिया की नजरें शुक्रवार की बैठक पर टिकी हैं। क्या पाकिस्तान इस टूटते हुए समझौते को बचा पाएगा, या फिर यह युद्धविराम महज एक बड़े महायुद्ध से पहले की एक छोटी सी खामोशी थी? इजरायल की उंगली ट्रिगर पर है, ईरान का गुस्सा सातवें आसमान पर है और पाकिस्तान इन दो दिग्गजों के बीच अपनी साख बचाने की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है।















