इस वक्त देश के अधिकतर बड़े शहर पॉल्यूशन की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। दिवाली के बाद कई मेट्रो सिटीज में एयर क्वालिटी इंडेक्स बहुत तेजी से बढ़ा है। राजधानी दिल्ली में AQI ‘गंभीर’ श्रेणी में बना हुआ है। वैसे तो इस वक्त जहरीली हवा में सांस लेना हर किसी व्यक्ति के लिए नुकसानदायक है, लेकिन खासकर बच्चों के लिए दमघोंटू हवा में सांस लेना जानलेवा साबित हो सकता है। दरअसल यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के एक्सपर्ट का ये कहना है कि दूषित हवा में पाए जाने वाले प्रदूषित कण युवाओं के मुकाबले बच्चों को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। ये कण बच्चों के शरीर पर अधिक हमला करते हैं।
यूनिसेफ और डब्ल्यूएचओ के एक्सपर्ट ने कई अंतरराष्ट्रीय निकायों की स्टडी के हवाले से ये बताया है कि जो बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं, उनके शरीर का विकास अच्छे से नहीं हो पाता है।
WHO का मानना है कि प्रदूषित हवा के दूषित कण छोटे बच्चों (खासकर नवजात) के फेफड़ों पर गंभीर असर डालते हैं। जो बच्चा दूषित हवा में सांस ले रहा है, हो सकता है जब तक वो एडल्ट हो तो उसके फेफड़ें काम करना बंद कर दें। फेफड़े कमजोर होने के कारण ऐसे बच्चों को बड़े होने पर अस्थमा की समस्या भी हो सकती है। वैश्विक स्वास्थ्य निकाय की 2018 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 93 प्रतिशत बच्चे, जिनकी उम्र 15 वर्ष से कम है वो जहरीली हवा में सांस लेते हैं।
– प्रदूषित हवा में मौजूद पीएम 2.5 के कण बच्चों के शरीर में फेफड़ों तक पहुंचते हैं तो वो बच्चों के ब्रेन और आंखों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
– आपको बता दें कि युवा या किशोरों की तुलना में बच्चे अधिक तेज सांस लेते हैं। एक युवा व्यक्ति 1 मिनट में 12 से 18 बार सांस लेता है, जबकि उसी एक मिनट में 20 से 30 बार सांस लेते हैं। ऐसे में वायु में मौजूद दूषित कण सांस के जरिए बच्चों के फेफड़ों तक अधिक पहुंचते हैं। यूनिसेफ के अनुसार, जहरीली हवा के कारण भारत सहित दक्षिण एशिया में हर साल लगभग 130,000 बच्चों की मौत हो जाती है।









