26 नवंबर 2008 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर कराची के रास्ते नाव से घुसे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने हमला कर दिया। हमलावरों ने मुंबई की अलग-अलग जगहों को निशाना बनाया। हमले की शुरुआत लियोपोल्ड कैफे और शिवाजी छत्रपति टर्मिनस से हुई। इसके बाद शहर के अलग-अलग हिस्सों से हमले की खबरें आने लगीं। इस आतंकी वारदात की 3 बड़ी जगहें ताज होटल, होटल ओबेरॉय और नरीमन हाउस थीं।
हमले में 160 से भी ज्यादा नागरिकों की मौत हुई और 300 से भी ज्यादा घायल हुए। आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में मुंबई पुलिस, एनएसजी और एसपीजी के 10 से ज्यादा जवान शहीद हुए। अगले 3 दिनों तक सुरक्षाबल आतंकवादियों से लोहा लेते रहे और 9 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। एक आतंकी अजमल कसाब जिंदा पकड़ा गया। जिसे आज ही के दिन 2010 में फांसी की सजा सुनाई गई।
कसाब को हमले के अगले ही दिन यानी 27 नवंबर को छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से गिरफ्तार किया गया था। जनवरी 2009 में स्पेशल कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई। इस दौरान कसाब को मुंबई की आर्थर रोड जेल में रखा गया। उज्जवल निकम को इस मामले में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर बनाया गया। 25 फरवरी को 11 हजार पन्नों की पहली चार्जशीट दाखिल की गई। इस दौरान कसाब के नाबालिग होने पर भी विवाद चलता रहा। इसी साल मई में पहले चश्मदीद गवाह ने कसाब के हमले में शामिल होने की पुष्टि की।
मार्च 2010 में केस से जुड़ी सुनवाई पूरी हो गई। 3 मई 2010 को कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कसाब को 26/11 हमले में दोषी पाया और 6 मई को फांसी की सजा सुनाई। 2011 में ये मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के पास गया और हाईकोर्ट ने स्पेशल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। सुप्रीम कोर्ट ने भी कसाब को राहत नहीं दी और फांसी की सजा पर मुहर लगा दी।
कसाब के पास अब केवल दया याचिका का एकमात्र विकल्प रह गया था। कसाब ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास दया याचिका भेजी, जिसे 5 नवंबर को राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया। 21 नवंबर 2012 को पुणे की येरवडा जेल में सुबह 7.30 बजे कसाब को फांसी दी गई। भारत ने कसाब के शव को पाकिस्तान को सौंपने की पेशकश की थी, लेकिन पाकिस्तान के मना करने के बाद जेल में ही शव को दफन कर दिया गया।









