आखिर नारी का ये कैसा सम्मान ,रामराज में महिलायें नहीं सुरक्षित ?

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जब कोई पुरुष किसी महिला से जीत नहीं पाता तो उसके लिए बड़ा आसान होता है उसकी इज्जत पर हाथ डालना. चाहें बात द्वापर की हो या फिर कलियुग की पुरुष अपने बल का प्रयोग महिला का चीरहरण करने में ही क्यों दिखाता है. हम यहां सभी पुरुषों की बात नहीं कर रहे, सभी पुरुष ऐसे होते भी नहीं जो महिलाओं पर जीत हांसिल करने के लिए अपनी ताकत का इस तरह इस्तेमाल करें. राजनीति में झड़प की घटनाएं तो होती ही रहती हैं. बंगाल का खेला होबे और मायावती का गेस्टहाउस कांड तो आपको याद ही होगा.

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उत्तर प्रदेश में ब्लॉक प्रमुख के चुनावों को लेकर हलचल तेज हुई थी,समझ आता है, होना भी चाहिए लेकिन किसी महिला के साथ इस तरह की बदसलूकी करके आप क्या दिखाना चाहते हैं.महिलाएं किसी भी युग की हों लोग बदला लेने के लिए उन्हें अपना निशाना बनाते हैं, ऐसे लोगों को उन पुरुषों से सीखना चाहिए जिनके लिए महिलाओं के सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं. जो महिलाओं को आगे बढ़ने में मदद करते हैं, ना की प्रतिस्पर्धा में अंधे होकर उसे बेआअबरू करते हैं.असल में पुरुष वो होता है जो औरतों की इज्जत करता है. ना की अपनी झूठी मर्दानगी दिखाने के नाम पर महिलाओं का अपमान करता है, यह काम तो तुच्छ पुरुषों का होता है.किसी पर भी अन्याय तथा अत्याचार किसी सभ्य समाज की निशानी नहीं हो सकती हैं. फिर समाज के एक बहुत बड़े भाग यानि स्त्रियों के साथ ऐसा करना प्रकृति के विरुद्ध हैं नारी को भी वो सभी प्राकृतिक अधिकार हासिल है जो कि एक पुरुष को हैं. उन्हें अबला मानकर उन पर अत्याचार करना कायरता हैं.

आज किसी भी क्षेत्र में नजर उठाकर देखियें, नारियां पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रगति में समान की भागीदार हैं. फिर उन्हें कम क्यों समझा जाता है यह अहम् सवाल है . हमें उनका आत्मविश्वास बढाकर उनका सहयोग करके समाज की उन्नति के लिए उन्हें साहस और हुनर का सही दिशा में उपयोग करना चाहिए तभी हमारा समाज प्रगति कर पाएगा.आए दिन नारी के साथ अत्याचार की घटनाओं में वृद्धि हो रही हैं. इन दिनों महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं में मानो उफान सा आ गया है | ऐसा कोई दिन नहीं बीतता जब देश के कई कोनों से महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं की खबर न आती हों | और अत्याचार भी एक से बढ़कर एक – दरिंदगी और हैवानियत की हद पार करती हुई | बलात्कार और विशेषतः सामूहिक बलात्कार की घटनाएँ अब तो आम बनती जा रही हैं ये दुष्कर्म, बलात्कार, एसिड डालकर चेहरा जला देने, दहेज़ उत्पीड़न और तलाक जैसे अपराध आज भी हमारी सोच पर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं

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.दिल्ली के निर्भया कांड ने न सिर्फ देश में बल्कि दुनियां भर में इस दरीन्दगी के स्वरूप को जगजाहिर किया हैं. हालांकि मानवता को शर्मसार कर देने वाली इस घटना से पूरे देश को शर्मिदा होना पड़ा मगर जो इसके बाद हुआ वो भारतीय समाज की असली पहचान थी.दोषियों को तुरंत पकड़ने तथा उन पर कठोर कार्यवाही करने के लिए देशभर में आंदोलन एवं सोशल मीडिया पर जो जन आक्रोश देखा गया, उसी आक्रोश को यदि हम अपने दिल में जिन्दा रखे तो संभव हैं हमारे समाज में इस तरह की घटना को अंजाम देने की कोई दरिन्दा नहीं सोचेगा. कहा जाता है जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है वहां देवता बसते है मगर असल में तो नारी पर सर्वाधिक अपराध तो हमारे देश में ही होते हैं.रोज महिला अत्याचार की ये घटनायें उन्ही दावों की पोल खोल देती हैं.सरकार को भी नारी अत्याचार को अंजाम देने वाले मनचलों के लिए विशेष कानूनों तथा कठोर सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए. कई बार आँखे शर्म से झुक जाती है जब छोटी छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार, गैंगरेप जैसी घटना सुनते हैं। दरअसल लोगों की सोच में ही अपराध बसा हुआ हैं. यदि आप किसी सामान्य 10 इंसानों से पूछ लीजिये नारी अत्याचारों का कारण क्या है,अधिकतर लोग आपको ये कारण गिनाएगे कि जींस नहीं पहननी चाहिए, अकेले नहीं जाना चाहिए, रात को घर से बाहर नही निकलना चाहिए।गौर करे तो यही कारण है नारी अत्याचार के तो फिर हमारे समाज और जंगल में फर्क क्या रह जाता हैं.

पर्यटकों को भी यह ही सलाह दी जाती है कि अकेले न जाए, रात को न जाए. फिर क्या मतलब है कानून का समाज का व्यवस्था का. लकड़ियाँ एवं महिलाएं भी समाज की मुख्य कड़ी हैं.क्या उन्हें लडकों की तरह पहनने, घूमने की आजादी नही. हमें अपनी सोच को बदलना चाहिए. इन्सान की सोच गंदी नहीं हो तो फिर सारी बाते कोई मायने नहीं रखती हैं. बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ अभियान के जरिये भारत सरकार निरंतर बालिकाओं को जन्म देने तथा उन्हें शिक्षित करने के लिए प्रेरित कर रही हैं.आज देश के कई राज्य ऐसे है जहाँ का लिंगानुपात सामान्य से बहुत नीचे हैं. हमें जरुरत है अपने नजरिये को बदले तभी हम भविष्य में आने वाली बड़ी मुसीबतों से बच सकते हैं.

अन्यथा यही हाल रहा तो वे दिन भी आए जाएगे जब कोई माँ अपनी कोख से बेटी को जन्म नहीं देना चाहेगी.इन अत्याचारों को रोकने के लिए समाज को भी कुछ कदम उठाने चाहिए. आजकल की अश्लील फिल्मों तथा सोशल मिडिया पर इस तरह के कंटेट को रोकने की आवश्यकता हैं. जिसका सीधा नकारात्मक प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता हैं.यदि बेहद अश्लील ढंग से टीवी पर विज्ञापन नित्य बच्चों को दिखाया जाएगा, उन्हें क्राइम की फ़िल्में ही यूँ दिखाई जाती रही तो एक दिन वह अपराध के खौफ से मुक्त हो जायेंगे साथ ही उन्हें किसी का कत्ल करने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं होगी. क्योंकि इसकी मानसिक शिक्षा तो उसे बचपन से ही घर बैठे टीवी पर मिल रही थी.अंत में बस यही कहना चाहूंगा कि यदि समय रहते हम इस तरफ ध्यान नहीं दे पाए तो न सिर्फ नारी पर अत्याचार आए दिन बढ़ेगे बल्कि हमारा समाज भी तेजी से गलत दिशा की ओर चला जाएगा, जहाँ से लौटना कठिन हो जाएगा.

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