Maharashtra Political Crisis: देश की राजनीति का रुख अब पूरी तरह बदल चुका है. कुछ समय पहले तक जहां हर किसी की नजरें बंगाल पर टिकी थीं, वहीं अब महाराष्ट्र का सियासी अखाड़ा सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. शिवसेना के उद्धव गुट में बड़ी बगावत की खबरों ने पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में एक जोरदार हलचल पैदा कर दी है. एकनाथ शिंदे का खेमा इस ताक में है कि उद्धव ठाकरे के सांसदों में इस तरह सेंध लगाई जाए जिससे देश की संसद के भीतर भी ताकत का पूरा संतुलन ही बदल जाए.
लेकिन इस समय सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि आखिर वे सांसद, जो उद्धव से बेहद खफा बताए जा रहे हैं, अभी तक खुलकर सामने क्यों नहीं आ रहे हैं. (Maharashtra Political Crisis) यह लड़ाई केवल जादुई नंबर जुटाने की नहीं है, बल्कि एक-दूसरे पर पक्के विश्वास की भी है. यही असली वजह है कि तमाम सीक्रेट बैठकों और कयासों के बाद भी ‘ऑपरेशन टाइगर 2’ अपने अंजाम तक पहुंचता नहीं दिख रहा है.
Maharashtra Political Crisis: क्या हैं नाराज सांसदों की शर्तें?
देश की राजधानी से लेकर मुंबई के सियासी गलियारों में इस समय जो सबसे बड़ा रोड़ा अटका हुआ है, वह बागी सांसदों की लंबी-चौड़ी मांगें हैं. अंदरूनी सूत्रों की मानें तो उद्धव ठाकरे के काम करने के तरीके और संगठन के फैसलों से कई नेता बहुत परेशान हैं. (Maharashtra Political Crisis) इसके बावजूद वे बिना किसी पक्के वादे या गारंटी के कोई नया कदम उठाने का जोखिम नहीं लेना चाहते. इन नेताओं की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में केंद्र सरकार में बड़ी कुर्सी, आने वाले चुनावों के लिए पक्का टिकट, अपने इलाके में मजबूत दबदबा और कानूनी मामलों से सुरक्षा शामिल है. यही वो वजह है जिसके चलते पूरा नंबर होने का दावा करने के बाद भी अंतिम फैसला बार-बार टल रहा है.
आखिर क्या चाहते हैं बागी?
इस पूरे हाई-प्रोफाइल ड्रामे का सबसे रोचक पहलू इन सांसदों की शर्तें ही हैं. खबरें आ रही हैं कि ठाकरे खेमे से दूरी बनाने वाले ये नेता सिर्फ दल बदलने में दिलचस्पी नहीं रख रहे हैं. वे सबसे पहले अपनी नई सियासी भूमिका को लेकर बिल्कुल साफ तस्वीर चाहते हैं. कुछ नेताओं की नजर दिल्ली में बड़े मंत्री पद पर है, तो कुछ अपने संसदीय क्षेत्र में संगठन की कमान और टिकट का पक्का वादा चाहते हैं. (Maharashtra Political Crisis) इसके अलावा कई सांसदों को इस बात का डर सता रहा है कि अगर आने वाले समय में राज्य के समीकरण बदले, तो उनका राजनीतिक करियर कहीं खतरे में न पड़ जाए. यही वजह है कि शिंदे गुट के साथ कई दौर की गुप्त मुलाकातों के बाद भी कोई अंतिम समझौता नहीं हो पा रहा है. जानकारों का कहना है कि आज के बदले हालात में हर नेता कदम फूंक-फूंक कर रख रहा है.
बीते दिन यह अफवाह जोरों पर थी कि छह सांसदों ने अलग ग्रुप बनाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को चिट्ठी भेज दी है. लेकिन जल्द ही बड़े नेताओं ने इस बात को पूरी तरह खारिज कर दिया. हकीकत यह थी कि जरूरी संख्या बल की कमी के कारण यह कदम पीछे खींचना पड़ा. बताया जा रहा है कि उन छह में से केवल चार सांसद ही दिल्ली पहुंच पाए थे, जिसके चलते पूरा ऑपरेशन अधर में लटक गया. देश के कानून के मुताबिक संसद में किसी भी नए गुट को असली मान्यता दिलाने के लिए दो-तिहाई सदस्यों का साथ होना बेहद जरूरी है. (Maharashtra Political Crisis) सत्ताधारी खेमा जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता जो बाद में अदालत में टिक न सके. इसलिए रणनीति साफ है कि जब तक पूरे नंबर और आपसी सहमति नहीं बनती, तब तक आगे नहीं बढ़ा जाएगा.
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ठाकरे खेमे की घेराबंदी
दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे का खेमा भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है. उन्होंने अपने कुनबे को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. सभी सांसदों के लिए कड़ा व्हिप जारी कर दिया गया है और आनन-फानन में बड़ी बैठक बुलाई गई है. (Maharashtra Political Crisis) इसके साथ ही लोकसभा अध्यक्ष के सामने अपनी बात भी रख दी गई है. ठाकरे गुट का साफ कहना है कि सिर्फ कुछ सांसदों को साथ मिला लेने भर से किसी को असली मान्यता नहीं मिल सकती. कानून के तहत उनका पक्ष सुनना भी जरूरी है. कुल मिलाकर, खेल अब सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि कानूनी रूप से भी बेहद पेचीदा हो चुका है. शिंदे गुट के सामने अब नंबरों के साथ-साथ भरोसे की दीवार को भी पार करने की बड़ी चुनौती है.














