Ram Mandir Row: रामनगरी अयोध्या में इन दिनों सिर्फ राम नाम का जाप ही नहीं गूंज रहा, बल्कि एक ऐसा सस्पेंस भी गहरा गया है जिसने पूरे देश को हैरान कर दिया है. एक तरफ जहां करोड़ों भक्तों की अगाध आस्था का केंद्र प्रभु श्रीराम का भव्य और दिव्य धाम है, वहीं दूसरी तरफ इसी पावन परिसर के भीतर चल रही एक बेहद गोपनीय और बड़ी जांच ने नए सवालों का बवंडर खड़ा कर दिया है.
विशेष जांच दल यानी SIT की टीमें दिन-रात एक करके इस रहस्य की परतें खोलने में जुटी हैं. जैसे-जैसे समय बीत रहा है, इस जांच का घेरा इतनी तेजी से फैल रहा है कि कई बड़े और रसूखदार कुर्सियों पर बैठे लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं. (Ram Mandir Row) अब बात सिर्फ एक छोटे से मामले की नहीं रह गई है, बल्कि पूरे सिस्टम की साख दांव पर लगी है.
Ram Mandir Row: टिन्नू यादव के बाद अब असली खिलाड़ी कौन?
शुरुआती दौर में जब इस मामले की भनक लगी, तो रमाशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव का नाम सबसे ऊपर आया और हर तरफ इसी नाम का शोर था. (Ram Mandir Row) लेकिन अंदरखाने से मिल रही खबरें बता रही हैं कि कहानी सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. एसआईटी की रडार पर अब वे तमाम चेहरे आ चुके हैं, जिनके कंधों पर इस अति-सुरक्षित परिसर की सुरक्षा, पल-पल की निगरानी और यहां आने-जाने वाले लोगों के प्रवेश को नियंत्रित करने की सीधी जिम्मेदारी थी.
यही वजह है कि कंप्यूटर और तकनीकी विभाग के स्टाफ से लेकर सुरक्षा बलों के जवानों और प्रशासनिक अधिकारियों को आमने-सामने बिठाकर कड़े सवाल पूछे जा रहे हैं. (Ram Mandir Row) जांचकर्ताओं का मानना है कि इतनी बड़ी जगह पर कोई भी खेल बिना किसी बड़ी मिलीभगत या लापरवाही के संभव नहीं हो सकता. इसलिए अब ध्यान किसी एक शख्स पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था को खंगालने पर है.
RMO अफसर क्यों आया रडार पर?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब एक बेहद खास पद पर तैनात अधिकारी का प्रोफाइल जांच एजेंसी के हाथ लगा. यह पद है रेडियो मेंटिनेंस ऑफिसर यानी RMO का, जिसके हाथ में पूरे मंदिर परिसर की तीसरी आंख यानी सीसीटीवी कैमरों की कमान है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह साहब पिछले 17 वर्षों से बिना किसी तबादले या बदलाव के इसी बेहद संवेदनशील जगह पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
अब एजेंसियां इस गुत्थी को सुलझाने में लगी हैं कि आखिर ऐसी क्या वजह थी जो इतने सालों तक इन्हें यहां से हिलाया तक नहीं गया. (Ram Mandir Row) एसआईटी ने अब सीसीटीवी कैमरों के काम करने के तरीके, उनके बैकअप के इंतजाम, डेटा को सुरक्षित रखने वाली हार्ड डिस्क और पूरे तकनीकी कंट्रोल रूम का पूरा कच्चा चिट्ठा अपने कब्जे में ले लिया है. पेन ड्राइव और डिजिटल रिकॉर्ड्स को बहुत बारीकी से खंगाला जा रहा है, जिससे साफ है कि गड़बड़ी की जड़ें बहुत गहरी हैं.
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जब तीसरी आंख का कड़ा पहरा था तो चूक कैसे हुई?
यह मंदिर भारत के उन चुनिंदा स्थानों में से एक है जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता. यहां कदम-कदम पर अत्याधुनिक कैमरे, कई स्तरों की मेटल डिटेक्टर जांच, विशेष पुलिस बल और सुरक्षा का ऐसा चक्रव्यूह है जिसे भेदना नामुमकिन माना जाता है. ऐसे में यह सवाल हर किसी के होश उड़ा रहा है कि अगर दान पेटियों या चढ़ावे की रकम के साथ कोई भी हेराफेरी हुई, तो वह इन हजारों कैमरों और आधुनिक मशीनों की नजरों से बच कैसे गई? क्या जानबूझकर उस समय कैमरों की नजरें कहीं और मोड़ दी गई थीं, या फिर इस अभेद्य किले के भीतर ही कोई ऐसा रास्ता था जिसके बारे में बाहर के लोगों को कोई अंदाजा नहीं था?
VIP पास और एंट्री का VIP खेल
अब जांच की आंच उस केबिन तक भी पहुंच गई है जहां से मंदिर परिसर में एंट्री के लिए खास डिजिटल पास जारी किए जाते हैं. सूत्रों की मानें तो जांच दल अब उन फाइलों को पलट रहा है जिनमें यह दर्ज है कि पिछले कुछ महीनों में किन-किन लोगों को विशेष पास बांटे गए. किस हैसियत और किस नियम के तहत ये पास बने और क्या एंट्री-एग्जिट के समय नियमों का पूरी तरह पालन हुआ या नहीं? कुछ बेहद रसूखदार और खास मेहमानों के आने-जाने के समय के सीसीटीवी फुटेज का भी मिलान किया जा रहा है. (Ram Mandir Row) शक जताया जा रहा है कि कहीं इस पास व्यवस्था की आड़ में कुछ लोगों को ऐसी छूट तो नहीं दे दी गई जिसने इस बड़ी चूक का रास्ता साफ कर दिया.
11 महीने और 10 करोड़ का बजट
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और सनसनीखेज पहलू वह भारी-भरकम बजट है, जिसे सुनकर आम आदमी की आंखें फटी की फटी रह जाएं. सरकारी दस्तावेजों और दावों के मुताबिक, पिछले महज 11 महीनों के भीतर इस परिसर की सुरक्षा और देखरेख पर लगभग 10 करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए गए. यह बड़ी रकम सुरक्षा के नए उपकरण खरीदने, हाई-टेक कैमरे लगाने और सुरक्षा कर्मियों के इंतजाम पर खर्च हुई थी. अब जनता और जांच एजेंसियां दोनों यही पूछ रही हैं कि जब सुरक्षा का बजट 10 करोड़ रुपये था, तो फिर इतनी बड़ी सेंधमारी की नौबत कैसे आ गई? यह पैसा आखिर किस सुरक्षा को मजबूत करने में लगा?
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने मचाया तहलका
मामला तब और ज्यादा गरमा गया जब इंटरनेट पर दान के पैसों की गिनती का एक कथित वीडियो तेजी से तैरने लगा. इस वीडियो में लोग बैठकर नोटों के बंडल गिनते हुए दिखाई दे रहे हैं और पहली नजर में सब कुछ कानून के मुताबिक और सामान्य लगता है. लेकिन एसआईटी इस वीडियो को महज एक सामान्य क्लिप मानकर छोड़ने के मूड में नहीं है. जांच अधिकारियों को लगता है कि यह वीडियो जितना सच दिखाने का दावा कर रहा है, उसके पीछे उतने ही राज छिपे हैं. अगर सब कुछ कैमरों के सामने और साफ-सुथरा था, तो फिर जांच टीम को बार-बार डेटा स्टोरेज और डिलीट हुए फुटेज को रिकवर करने के लिए एक्सपर्ट्स की मदद क्यों लेनी पड़ रही है?
200 लोगों की लिस्ट और मैराथन पूछताछ
एसआईटी की इस कार्रवाई से पूरे महकमे में हड़कंप मचा हुआ है क्योंकि जांच टीम ने लगभग 200 लोगों की एक लंबी सूची तैयार की है जिनसे आमने-सामने पूछताछ होनी है. इनमें से 125 से ज्यादा लोगों के बयान पहले ही दर्ज किए जा चुके हैं. कई कर्मचारियों को तो एक बार बयान देने के बाद दोबारा समन भेजकर बुलाया गया है ताकि उनके पुराने और नए बयानों की कड़ियों को आपस में जोड़ा जा सके. टिन्नू यादव से भी बंद कमरे में घंटों तक सवाल-जवाब किए गए हैं, और सूत्रों का कहना है कि जैसे-जैसे सवाल बढ़ रहे हैं, कई चेहरों का रंग उड़ रहा है.
ट्रस्ट के बड़े चेहरों की कार्यप्रणाली पर भी नजर
भले ही जांच एजेंसियों ने अभी तक किसी बड़े नाम को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन वे मंदिर ट्रस्ट के पूरे प्रशासनिक ढांचे और काम के बंटवारे को बहुत गहराई से समझ रही हैं. इस पूरे तंत्र को चलाने वाले प्रमुख चेहरों के जिम्मे अलग-अलग बड़ी जिम्मेदारियां हैं:
अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास: वे सभी महत्वपूर्ण बैठकों का नेतृत्व करते हैं और बड़े फैसलों में मुख्य प्रतिनिधित्व संभालते हैं.
महासचिव चंपतराय: उनके पास ऑडिट समिति की कमान है और वे तमाम आयोजनों के साथ-साथ बैठकों का पूरा मैनेजमेंट देखते हैं.
कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंददेव गिरि: वे वित्त समिति के मुखिया हैं और दान की राशि से लेकर पैसे के हर लेन-देन और वित्तीय प्रबंधन पर नजर रखते हैं.
सदस्य नृपेंद्र मिश्र: वे मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष के रूप में चल रहे कामों की लगातार समीक्षा करते हैं.
सदस्य स्वामी विश्वप्रसन्नतीर्थ: वे धार्मिक समिति के प्रमुख के तौर पर धार्मिक गतिविधियों और बैठकों में हिस्सा लेते हैं.
सदस्य डॉ. अनिल कुमार मिश्र: उनके जिम्मे सभी प्रकार के प्रशासनिक कार्य और उनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है.
विशेष आमंत्रित सदस्य गोपाल राव: वे दर्शन व्यवस्था, आरती के पास और मंदिर से जुड़े तमाम दैनिक प्रबंधनों को संभालते हैं.
इन सभी जिम्मेदार पदों और इनके कार्यक्षेत्रों का अध्ययन यह जानने के लिए किया जा रहा है कि आखिर व्यवस्था में वह कौन सा लूपहोल था जिसका फायदा उठाया गया.
आम भक्तों के मन में उठा गहरी चिंता का ज्वार
दूर-दूर से अपनी गाढ़ी कमाई और अटूट श्रद्धा लेकर आने वाले आम श्रद्धालुओं के बीच भी इस समय केवल इसी मुद्दे की चर्चा है. लोग हैरान हैं कि जिस राम मंदिर की सुरक्षा के लिए देश की सबसे बेहतरीन एजेंसियां और तकनीक तैनात हैं, वहां ऐसी बातें सामने कैसे आ सकती हैं. भक्तों का कहना है कि रामलला के दरबार में ऐसी अपारदर्शिता किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जा सकती और सच जल्द से जल्द सामने आना ही चाहिए.
किसी बड़े अधिकारी पर गिरेगी गाज?
चौथे दिन की जांच खत्म होने के बाद एक बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि यह मामला सिर्फ कुछ रुपयों की कथित चोरी का नहीं रह गया है. एसआईटी बेहद सधे हुए कदमों से आगे बढ़ रही है और किसी भी तरह की जल्दबाजी में नहीं है. जांच की जो दिशा दिखाई दे रही है, वह साफ इशारा कर रही है कि आने वाले कुछ दिन छत्तीसगढ़ से लेकर उत्तर प्रदेश और पूरे देश की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में बड़ा भूचाल ला सकते हैं. अब देखना यह है कि 10 करोड़ की इस चक्रव्यूह जैसी सुरक्षा को भेदने वाले असली मास्टरमाइंड का मुखौटा कब उतरता है.















