उत्तर प्रदेश में जैसे जैसे चुनाव का समय नजदीक आ रहा है वैसे वैसे तमाम राजनीतिक दल अपनी बिसात बिछाते जा रहे हैं। लेकिन छोटे और बडे़ लगभग सभी दलों के लिए ओवैसी की पार्टी एक तरह से अछूत बनी हुई है। कोई भी बड़ा दल या छोटा दल सामने आकर उनसे गठबंधन करने को तैयार नहीं हो रहा है। सियासी गणित में उलझे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी अब यूपी में अपनी यात्राएं शुरू कर लगातार मुख्य विपक्षी दलों पर निशाना साध रहे हैं और अकेले की चुनावी मैदान में कूदने का दावा ठोक रहे हैं। दरअसल, यूपी में 19% मुस्लिम आबादी है और ओवैसी इस समुदाय के भीतर अपने करिश्मे और अपील के बावजूद, अब तक इसे एक लोकप्रिय चुनावी समर्थन के रूप में बदलने में विफल रहे हैं।
मुख्य विपक्षी दल एआईएमआईएम को भाव नहीं दे रहे हैं। कुछ दिनों पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने स्पष्ट रूप से एआईएमआईएम के साथ गठबंधन करने की किसी भी संभावना से इनकार कर दिया था। हालांकि ओवैसी ने बसपा के साथ किसी भी तरह की बातचीत से इनकार किया, लेकिन उनकी पार्टी का चुनाव लड़ने पर पूरा जोर लगा रही है। मायावती ने अपने ट्वीट में इस तरह की अटकलों को “निराधार और बसपा को कमजोर करने का प्रयास” करार दिया था। उन्होंने कहा था कि बसपा चुनाव में अकेले उतरेगी।
आम आदमी पार्टी (आप) ने भी घोषणा की है कि उसका एआईएमआईएम के किसी भी गठबंधन से कोई लेना-देना नहीं है। पार्टी का रुख एआईएमआईएम के हाल ही में भागीदारी संकल्प मोर्चा का हिस्सा बनने की पृष्ठभूमि में आता है, जो नौ छोटे दलों द्वारा बनाया गया एक राजनीतिक मोर्चा है, जिसमें मुख्य रूप से ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) शामिल है।
AIMIM ने 2017 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में अपनी किस्मत आजमायी थी। पार्टी ने 38 सीटों पर चुनाव लड़ी था, लेकिन छाप छोड़ने में नाकाम रही। चार सीटों को छोड़कर, अन्य सभी निर्वाचन क्षेत्रों में उसके उम्मीदवारों की जमानत चली गई। पार्टी को दो लाख से थोड़ा अधिक वोट मिले, जो कुल वोटों का लगभग 0.2% था। 2019 के आम चुनावों में, AIMIM ने उत्तर प्रदेश में गैर-भाजपा वोटों में विभाजन न हो इसका बहाना लेकर चुनाव नहीं लड़ा। दरअसल मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा को रोकने के अपने प्रयास में या तो सपा या बसपा को ही अपने विकल्प के तौर पर चुना था।













