AAP Crisis: आम आदमी पार्टी (AAP) को उस समय बड़ा राजनीतिक झटका लगा जब उसके सात राज्यसभा सांसदों ने अचानक पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया। इस घटनाक्रम ने दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी है और पार्टी नेतृत्व पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। शुक्रवार को हुए इस घटनाक्रम से पहले ही अरविंद केजरीवाल को इसकी भनक लग चुकी थी और उन्होंने सांसदों को रोकने की कोशिश भी की थी, लेकिन अंततः वे सफल नहीं हो सके।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, केजरीवाल ने 22 अप्रैल से ही संभावित असंतोष को भांपते हुए सांसदों से बातचीत शुरू कर दी थी। (AAP Crisis) उन्होंने विक्रमजीत साहनी, अशोक मित्तल और संदीप पाठक से व्यक्तिगत मुलाकातें की थीं। वहीं, मुंबई में मौजूद हरभजन सिंह से भी संपर्क साधा गया था। सूत्रों के अनुसार, केजरीवाल को खास तौर पर संदीप पाठक के फैसले से गहरा झटका लगा, क्योंकि वे उन्हें पार्टी का बेहद वफादार नेता मानते थे। बताया जा रहा है कि 22 अप्रैल को साहनी के साथ हुई बैठक में केजरीवाल ने सीधे पूछा था कि क्या उन्हें भाजपा में शामिल होने का प्रस्ताव मिला है।
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वहीं, संदीप पाठक के साथ करीब डेढ़ घंटे चली बातचीत में केजरीवाल को भरोसा था कि वे पार्टी नहीं छोड़ेंगे। इसके बावजूद शुक्रवार को स्थिति अचानक बदल गई और सभी सात सांसदों ने पाला बदल लिया। (AAP Crisis) इस सूची में राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रमजीत साहनी और स्वाति मालीवाल शामिल हैं। (AAP Crisis) दल-बदल के पीछे की वजहों पर नजर डालें तो रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि संदीप पाठक लंबे समय से पार्टी से असंतुष्ट थे। दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्हें धीरे-धीरे हाशिए पर डाल दिया गया था, जिससे उनकी नाराजगी बढ़ती गई। इसी तरह अन्य नेताओं ने भी पार्टी नेतृत्व पर सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों से भटकने के आरोप लगाए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद आम आदमी पार्टी ने कड़ा रुख अपनाया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन को पत्र लिखकर इन सातों सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है। उन्होंने इसे स्पष्ट रूप से दल-बदल करार दिया और कहा कि यह न केवल पार्टी बल्कि जनता के विश्वास के साथ भी धोखा है। (AAP Crisis) संजय सिंह ने यह भी संकेत दिया कि यदि जरूरत पड़ी तो पार्टी इस मामले को अदालत तक ले जाएगी। उनका कहना है कि इन सांसदों को पार्टी ने चुना था, लेकिन बाद में उन्होंने दूसरी पार्टी में शामिल होने का फैसला लिया, जो संविधान की भावना के खिलाफ है। फिलहाल, इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम ने आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।















