Arvind Kejriwal crisis: आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए शुक्रवार का दिन किसी कालक्रम की तरह साबित हुआ है। राघव चड्ढा समेत 7 राज्यसभा सांसदों का इस्तीफा और भाजपा में विलय की घोषणा केवल एक साधारण दलबदल नहीं है, बल्कि यह अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक साम्राज्य की नींव हिला देने वाली घटना है। (Arvind Kejriwal crisis) दिल्ली और पंजाब के गलियारों में अब एक ही चर्चा गर्म है- क्या राघव चड्ढा ने पर्दे के पीछे केजरीवाल के साथ वही खेल शुरू कर दिया है जो महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे और अजित पवार ने शरद पवार के साथ किया था? यह महज पाला बदलने का खेल नहीं, बल्कि पूरी की पूरी ‘आम आदमी पार्टी’ पर कब्जे की एक बड़ी कानूनी और राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है।
Arvind Kejriwal crisis: दलबदल कानून की पेचीदगी और 2/3 का जादुई आंकड़ा
राघव चड्ढा ने दावा किया है कि राज्यसभा में ‘आप’ के 10 में से 7 सांसद उनके साथ हैं। तकनीकी रूप से 7 का यह आंकड़ा दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत की शर्त को पूरा करता है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मामला इतना सीधा नहीं है। (Arvind Kejriwal crisis) पूर्व लोकसभा महासचिव पी.डी.टी. आचार्य के अनुसार, सांसदों की सदस्यता बचाने के लिए केवल संसदीय दल का नहीं, बल्कि ‘मूल पार्टी’ का विलय होना जरूरी है। यहीं से राघव चड्ढा का ‘मास्टरस्ट्रोक’ शुरू होता है। राघव अब चुनाव आयोग और राज्यसभा सभापति के सामने यह दावा कर सकते हैं कि वे और उनके साथी ही ‘असली आम आदमी पार्टी’ हैं, और बहुमत उनके पास है।
क्या दोहराया जाएगा महाराष्ट्र का फॉर्मूला? राघव बनेंगे ‘आप’ के शिंदे
महाराष्ट्र में जो खेल शिवसेना और एनसीपी के साथ हुआ, राघव चड्ढा की रणनीति बिल्कुल उसी दिशा में बढ़ती दिख रही है। सबसे पहले उन्होंने राज्यसभा में संख्या बल का प्रदर्शन किया है। अब अगला कदम चुनाव आयोग में यह सिद्ध करना होगा कि संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों का बड़ा हिस्सा उनके पास है। (Arvind Kejriwal crisis) अगर वे इसमें कामयाब रहे, तो ‘झाड़ू’ चुनाव चिह्न और पार्टी का नाम उनके गुट को मिल सकता है। जिस तरह उद्धव ठाकरे अपनी ही बनाई पार्टी में बेगाने हो गए, वैसी ही स्थिति केजरीवाल के साथ भी बन सकती है। यह केजरीवाल को राजनीतिक रूप से ‘फिनिश’ करने की एक सोची-समझी योजना नजर आ रही है।
विश्वासघात की टीस या राजनीतिक अस्तित्व की मजबूरी?
पार्टी के भीतर यह दरार तब और चौड़ी हुई जब राघव चड्ढा को राज्यसभा में उप-नेता के पद से हटाया गया। राघव का आरोप है कि उन्हें केजरीवाल की गलतियों की सजा दी जा रही थी, जबकि संजय सिंह उन्हें ‘गद्दार’ कह रहे हैं। (Arvind Kejriwal crisis) असल में यह लड़ाई अब विचारधारा की नहीं बल्कि ‘सर्वाइवल’ की है। राघव जानते हैं कि अगर वे सिर्फ व्यक्तिगत रूप से भाजपा में जाते हैं, तो उनकी सदस्यता रद्द हो सकती है। इसलिए उनका एकमात्र रास्ता यह साबित करना है कि वे ही ‘असली आम आदमी पार्टी’ के वारिस हैं। यह केजरीवाल के लिए अब तक का सबसे बड़ा व्यक्तिगत और राजनीतिक विश्वासघात साबित हो सकता है।
क्या होगा आगे? व्हिप और संगठन में फूट का संकट
अगर राघव चड्ढा चुनाव आयोग में अपनी दावेदारी ठोकते हैं, तो यह कानूनी लड़ाई लंबी खिंच सकती है। इस दौरान सबसे बड़ा सवाल ‘व्हिप’ (Whip) जारी करने के अधिकार का होगा। सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों के अनुसार, व्हिप का अधिकार मूल राजनीतिक दल के पास होता है, लेकिन ‘असली दल’ कौन है, यह तय होने तक अराजकता की स्थिति बनी रहेगी। (Arvind Kejriwal crisis) राघव का अगला लक्ष्य पंजाब और दिल्ली के विधायकों को अपने पाले में करना होगा। अगर वे विधानसभाओं में भी सेंध लगाने में कामयाब रहे, तो केजरीवाल के लिए अपनी सरकारें बचाना नामुमकिन हो जाएगा।
केजरीवाल की विरासत पर कब्जे की कोशिश
राघव चड्ढा का यह कदम महज एक दलबदल नहीं, बल्कि अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक विरासत पर कब्जे की सीधी कोशिश है। (Arvind Kejriwal crisis) एक समय पर केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रहे राघव चड्ढा अब उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे हैं। क्या केजरीवाल अपनी पार्टी और चुनाव चिह्न बचा पाएंगे या राघव चड्ढा ‘शिंदे’ बनकर पूरी पार्टी पर काबिज हो जाएंगे, यह आने वाले कुछ हफ्तों में साफ हो जाएगा। फिलहाल, ‘आप’ के भविष्य पर अनिश्चितता के काले बादल मंडरा रहे हैं।















