Bihar News: बिहार की कृषि और किसानों को लेकर एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने राज्य के सियासी और कृषि गलियारों में हलचल तेज कर दी है। सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने केंद्र को मिट्टी जांच का जो प्रस्ताव भेजा था, उस पर केंद्र सरकार ने ‘कैंची’ चला दी है। (Bihar News) इस फैसले से राज्य के उन लाखों किसानों की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है जो अपनी जमीन की सेहत सुधारने के लिए सरकारी मदद का इंतजार कर रहे थे। बिहार ने 2026-27 के लिए 6 लाख मिट्टी के नमूनों की जांच का बड़ा लक्ष्य रखा था, लेकिन केंद्र ने इसमें सीधे 75 फीसदी की कटौती कर केवल डेढ़ लाख नमूनों को ही मंजूरी दी है।
Bihar News: लक्ष्य हुआ आधा: पिछले वर्षों के मुकाबले कम हुई संख्या
केंद्र सरकार के इस फैसले ने सबको हैरान इसलिए किया है क्योंकि बिहार पिछले कई सालों से अपने लक्ष्यों को समय पर पूरा करता आ रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2025-26 में राज्य को 3 लाख नमूनों की जांच का लक्ष्य मिला था, जिसे इस बार घटाकर आधा यानी 1.5 लाख कर दिया गया है। इससे पहले 2024-25 में यह लक्ष्य 5 लाख था। (Bihar News) लगातार कम होते इन आंकड़ों ने अब कृषि विभाग की चिंता बढ़ा दी है। विभाग को अब फिर से जिलावार नए लक्ष्य तय करने होंगे ताकि कम संसाधनों में अधिक से अधिक काम किया जा सके। विभाग इन नए लक्ष्यों को दोबारा मंजूरी के लिए केंद्र को भेजने की तैयारी में जुटा है।
बजट का गणित: 40 फीसदी बोझ उठाती है राज्य सरकार
मिट्टी जांच की यह पूरी प्रक्रिया ‘राष्ट्रीय कृषि विकास योजना’ के तहत चलती है। यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसमें खर्चे का बड़ा हिस्सा यानी 60 फीसदी केंद्र सरकार देती है, जबकि बाकी का 40 फीसदी बोझ राज्य सरकार उठाती है। (Bihar News) पिछले साल हुई 3 लाख जांचों में से 50 हजार नमूने विशेष रूप से प्राकृतिक खेती वाली जमीन के थे। प्राकृतिक खेती के लिए हर साल जांच अनिवार्य होती है, जबकि सामान्य खेती के लिए यह तीन साल में एक बार की जाती है। केंद्र की कटौती के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या राज्य सरकार अपने हिस्से का बजट बढ़ाकर इस कमी को पूरा कर पाएगी?
क्यों जरूरी है मिट्टी जांच? किसानों की आय पर पड़ेगा असर
मिट्टी की जांच केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह किसानों की आय और फसल की गुणवत्ता से जुड़ी है। जांच के बाद किसानों को उनके व्हाट्सएप पर डिजिटल ‘सॉइल हेल्थ कार्ड’ मिलता है, जो तीन साल तक वैध रहता है। इसमें 106 तरह की फसलों, फलों और सब्जियों के लिए सही खाद और उर्वरक की मात्रा बताई जाती है। (Bihar News) वैज्ञानिकों का मानना है कि जरूरत के हिसाब से खाद डालने से न केवल फसल की पैदावार बढ़ती है, बल्कि अनावश्यक रासायनिक खादों पर होने वाला खर्च भी बचता है। अब जब लक्ष्य कम हो गए हैं, तो लाखों किसान इस तकनीकी सलाह से वंचित रह सकते हैं।
बिहार का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार, पर काम में आई रुकावट
बिहार में मिट्टी जांच के लिए ढांचा पूरी तरह तैयार है। राज्य के सभी 38 जिलों में आधुनिक प्रयोगशालाएं मौजूद हैं। इसके अलावा प्रमंडल स्तर पर 46 और 3 बड़ी रेफरल प्रयोगशालाएं काम कर रही हैं। बीज परीक्षण और गुण नियंत्रण के लिए भी अलग-अलग लैब बनाई गई हैं। (Bihar News) इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद अगर केंद्र से नमूनों की जांच का लक्ष्य कम मिलता है, तो इन प्रयोगशालाओं की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा। अब देखना यह है कि सम्राट चौधरी सरकार इस ‘झटके’ से उबरने के लिए क्या नया रास्ता निकालती है और क्या केंद्र सरकार अपने फैसले पर दोबारा विचार करेगी।














