Mayawati on Bangladesh Hindus: दलित राजनीति में सबसे बड़ा ट्विस्ट! बांग्लादेश से Article 370 तक बदली रणनीति, CM योगी की लाइन पर चल पड़ीं मायावती?

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Mayawati on Bangladesh Hindus: भारत की राजनीति में दलित नेतृत्व की भूमिका हमेशा से बहस का गर्म विषय रही है। दलित अधिकार, सामाजिक न्याय और संवैधानिक समानता के नाम पर राजनीति करने वाले कई नेता समय-समय पर बड़े और गंभीर मुद्दों पर अक्सर चुप्पी साध लेते हैं। लेकिन हालिया घटनाक्रम, बांग्लादेश में हिंदुओं, विशेषकर दलित हिंदुओं पर कथित रूप से अत्याचार और भारत में उस पर राजनीतिक प्रतिक्रिया ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि असली दलित नेतृत्व कौन कर रहा है। इसी संदर्भ में बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती का रुख उन्हें अन्य दलित नेताओं से अलग खड़ा करता दिखाई पड़ रहा है।

Mayawati on Bangladesh Hindus: अनुच्छेद 370 और दलितों का सवाल

अनुच्छेद 370 के दौर में जम्मू-कश्मीर में बसे दलित समुदाय, खासकर सफाईकर्मियों की स्थिति लंबे वक़्त से चर्चा में रही। (Mayawati on Bangladesh Hindus) स्थायी निवास प्रमाण पत्र (PRC) से जुड़े नियमों की वजह से कई परिवारों को सिर्फ ‘स्वीपर वर्क’ तक सीमित कर दिया गया था। यह व्यवस्था न सिर्फ सामाजिक बल्कि संवैधानिक समानता के भी खिलाफ मानी गई। उस वक़्त पूरे देश में दलित राजनीति करने वाले ज़्यादातर नेता इस मुद्दे पर मुखर नहीं दिखे। संसद में जब अनुच्छेद 370 पर फैसला हुआ, तब मायावती उन चुनिंदा नेताओं में रहीं जिन्होंने सरकार के पक्ष में वोट देकर यह संकेत बड़ा दे दिया कि यह फैसला दलितों के हित में भी है।

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बांग्लादेश में हिंदू और दलितों पर कथित अत्याचार

अब यही बहस बांग्लादेश को लेकर सामने आई है। (Mayawati on Bangladesh Hindus) बीते कुछ महीनों में वहां हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा, लिंचिंग और आगजनी की खबरों ने भारत में भी चिंता बढ़ा दी हैं। कई रिपोर्ट्स और राजनीतिक दावों में यह कहा गया कि इन घटनाओं का शिकार होने वालों में बड़ी संख्या दलित हिंदुओं की है, जो ऐतिहासिक कारणों से बांग्लादेश में रह गए थे। इसके बावजूद भारत की विपक्षी राजनीति का बड़ा भाग इस मुद्दे पर खुलकर बोलता नहीं दिखा।

विपक्ष की चुप्पी और सवाल

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब फिलिस्तीन जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भारत में जमकर बयानबाजी होती है, तब बांग्लादेशी हिंदुओं के मामले में चुप्पी सवाल खड़े करती है। कई विपक्षी नेताओं के बयानों को लेकर अब भी विवाद हुआ, जिनमें कहा गया कि ‘बांग्लादेशी हिंदुओं का भारत से क्या लेना-देना?’ इस रवैये पर सत्तापक्ष ने तगड़ा हमला बोला और इसे दोहरे मापदंड करार दिया।

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मायावती का ट्वीट से बदल गया रुख

इसी माहौल में मायावती का बयान और ट्वीट खास महत्व रखता है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि बांग्लादेश में फंसे हिंदुओं की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और आवश्यकता पड़े तो उन्हें भारत लाने पर भी विचार किया जाए। (Mayawati on Bangladesh Hindus) इन अबके बीच सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने इसे सिर्फ ‘हिंदू मुद्दा’ नहीं, बल्कि मानवाधिकार और संवैधानिक जिम्मेदारी के रूप में पेश किया। यह वही मायावती हैं जिन्होंने अतीत में खुद को बौद्ध पहचान से जोड़ते हुए हिंदू राजनीति से दूरी बनाई थी, लेकिन अब उनका रुख बदला हुआ दिखाई दे रहा है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे कथित अत्याचारों का मुद्दा काफी जोर-शोर से उठाया। (Mayawati on Bangladesh Hindus) उन्होंने विपक्ष पर सवाल दागते हुए पूछा कि क्या उन्हें वहां दलित और हिंदू दिखाई नहीं देते। इसी मुद्दे पर मायावती का सुर योगी आदित्यनाथ से मिलता दिखा। राजनीतिक गलियारों में इसे असामान्य लेकिन महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

क्या मायावती बन रही हैं ‘एक्सक्लूसिव दलित लीडर’?

ऐसे में अब समर्थकों का मानना है कि मायावती का यह रुख उन्हें देश की ‘एक्सक्लूसिव दलित लीडर’ के रूप में स्थापित करता नज़र आ रहा है, जो केवल चुनावी राजनीति नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक सरोकारों पर भी बोलती हैं। (Mayawati on Bangladesh Hindus) आलोचकों का तर्क है कि यह बदली हुई रणनीति हो सकती है, लेकिन इतना तय है कि इस बार उन्होंने ऐसा मुद्दा उठाया है, जिस पर बाकी दलित नेतृत्व खामोश रहा।

बता दे, अनुच्छेद 370 से लेकर बांग्लादेश में दलित हिंदुओं पर कथित अत्याचार तक, मायावती का रुख उन्हें अन्य दलित नेताओं से अलग करता है। (Mayawati on Bangladesh Hindus) योगी आदित्यनाथ के साथ सुर मिलाकर उन्होंने यह बड़ा और महत्वपूर्ण संकेत दे दिया है कि दलित राजनीति सिर्फ जातिगत सीमाओं तक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सरोकारों से भी जुड़ी है। अब आगामी वक़्त में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या अन्य दलित नेता भी इस मुद्दे पर खुलकर सामने आते हैं या मायावती की यह लाइन उन्हें दलित राजनीति में एक अलग मुकाम पर ले जाती है।

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