Ritabrata Banerjee: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों ज़बरदस्त सियासी भूचाल देखने को मिल रहा है। बीते 15 सालों से राज्य की सत्ता पर राज करने वाली TMC अब अपने सबसे बड़े अंदरूनी संकट का सामना करती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी में लगातार बढ़ती जा रही नाराजगी और बगावत ने राजनीतिक गलियारों में तेज हलचल मचा दी है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं ऋतब्रत बनर्जी, जिन्हें कभी ममता बनर्जी का सब से करीबी और विश्वसनीय नेता माना जाता था, लेकिन अब वही TMC के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आ गए हैं।
हाल ही में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए गए ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि उन्हें 58 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इतना ही नहीं, उन्होंने विधानसभा में पहुंचकर विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) के रूप में मान्यता की मांग भी की, जिसे विधानसभा अध्यक्ष द्वारा स्वीकार किए जाने की खबर ने बंगाल की राजनीति पारा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है।
ऋतब्रत बनर्जी का राजनीति सफर
ऋतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफर छात्र जीवन से शुरू हुआ था। कोलकाता के साउथ प्वाइंट हाई स्कूल, आशुतोष कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद ऋतब्रत पहली बार साल 2000 में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए। मात्र 21 साल की उम्र में उन्हें CPI(M) के छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) का अखिल भारतीय महासचिव बनाया गया था।
उन्होंने करीब 8 सालों तक संगठन का नेतृत्व किया और वामपंथी राजनीति में एक उभरते युवा चेहरे के रूप में अपनी पहचान बनाई। उस दौर में CPI(M) पर युवा नेतृत्व को आगे न बढ़ाने के आरोप लगते थे, लेकिन ऋतब्रत का तेजी से उभरना उनके संगठनात्मक कौशल और वरिष्ठ नेताओं के विश्वास का बड़ा नतीजा माना गया।
34 साल की उम्र में बने राज्यसभा सांसद
Ritabrata Banerjee का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया और साल 2014 में वह मात्र 34 साल की उम्र में राज्यसभा सांसद बन गए। यह उपलब्धि उन्हें वाम राजनीति के सबसे प्रभावशाली युवा नेताओं में शामिल करने के लिए पर्याप्त थी।
हालांकि, उनका यह सफर आधी वक़्त तक कुछ ख़ास नहीं चल सका। साल 2017 में CPI(M) ने उन्हें पहले निलंबित और बाद में पार्टी से निष्कासित कर दिया। पार्टी ने उन पर अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप लगाए। इसके अलावा उनकी जीवनशैली को भी पार्टी की विचारधारा के बिलकुल उलट बताया गया।
विवादों के बीच TMC में हुई एंट्री
CPI(M) से अलग होने के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने साल 2018 में तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया। (Ritabrata Banerjee) उस वक़्त उन्होंने ममता बनर्जी को “देश की असली वामपंथी नेता” बताया था। TMC में शामिल होने के बाद उन्हें पार्टी की ट्रेड यूनियन गतिविधियों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं। इसी दौरान उनका नाम एक विवाद में भी सामने आया, जब एक महिला शोधार्थी ने उन पर शादी का झूठा वादा कर शोषण करने का आरोप लगाया था। हालांकि, ऋतब्रत ने इन आरोपों को साफ़ खारिज करते हुए महिला पर ब्लैकमेल और जबरन वसूली का आरोप लगाया था।
TMC में बढ़ा कद, फिर शुरू हुई दूरी
TMC में शामिल होने के बाद ऋतब्रत का राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ता गया। (Ritabrata Banerjee) साल 2024 में पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार के इस्तीफे के बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा। इसके बाद 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने उलुबेरिया पुरबा सीट से जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत कर ली।
हालांकि, चुनाव जीतने के बाद उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। (Ritabrata Banerjee) दिल्ली स्थित बंग भवन में विपक्ष के नेता शुवेंदु अधिकारी से उनकी मुलाकात का वीडियो वायरल होने के बाद राजनीतिक अटकलें तेज हो गईं। ऋतब्रत ने इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया, लेकिन पार्टी के भीतर इसे लेकर असहजता बढ़ती गई।
निष्कासन के बाद बढ़ा सियासी संग्राम
बता दे, 1 जून को तृणमूल कांग्रेस ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया। पार्टी ने उन पर संगठन विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया। इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और ऋतब्रत ने 58 विधायकों के समर्थन का दावा कर दिया।
ममता बनर्जी ने बिना नाम लिए आरोप लगाया कि पार्टी को तोड़ने की साजिश “दिल्ली से रची गई” है। (Ritabrata Banerjee) वहीं, ऋतब्रत का कहना है कि उनका विवाद ममता बनर्जी से नहीं बल्कि पार्टी के अंदर कुछ नेताओं की कार्यशैली से है। उन्होंने यह भी कहा कि वे बंगाल की राजनीति में लोकतांत्रिक मूल्यों और संगठनात्मक सुधारों की लड़ाई लड़ रहे हैं।
क्या TMC के सामने खड़ा हो गया है बड़ा संकट?
इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन दावा सही साबित होता है, तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए अब तक का सबसे बड़ा आंतरिक संकट हो सकता है। बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी के अंदर बढ़ती असंतोष की आवाजें ममता बनर्जी के लिए नई चुनौती बन सकती हैं।
फिलहाल पूरे देश की निगाहें पश्चिम बंगाल की राजनीति पर टिकी हुई है। आगामी दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि ऋतब्रत बनर्जी की बगावत सिर्फ एक राजनीतिक दबाव की रणनीति है या फिर TMC में किसी बड़े विभाजन की शुरुआत।















