Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े और गंभीर राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी के भीतर उभरे एक बागी गुट ने टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों के अपने साथ होने का एक बड़ा दावा ठोक दिया है। बंगाल की इस मौजूदा स्थिति ने साल 2022 में महाराष्ट्र में हुए शिवसेना विवाद की पुरानी यादों को पूरी तरह से ताजा कर दिया है। अब इस बात का फैसला करने में कि राज्य में कौन सा गुट असली तृणमूल कांग्रेस है, पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और निर्णायक होने जा रही है। (Bengal Politics) हमारे देश के संविधान की दसवीं अनुसूची दलबदल जैसी राजनीतिक बुराई को रोकने का काम करती है। आइए बहुत ही सरल शब्दों में समझते हैं कि ऐसे बड़े राजनीतिक संकट के समय हमारे कानूनी नियम क्या कहते हैं और इस पर सुप्रीम कोर्ट के जरूरी दिशा-निर्देश क्या हैं।
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Bengal Politics: क्या कहता है कानून?
भारतीय संविधान के नियमों के अनुसार, साल 2003 में एक बड़ा संशोधन करते हुए दसवीं अनुसूची से पैराग्राफ 3 को पूरी तरह हटा दिया गया था। इस महत्वपूर्ण बदलाव के बाद, अब कोई भी विधायक अयोग्यता की कानूनी कार्यवाही से बचने के लिए अपनी ही पार्टी में विभाजन या ‘स्प्लिट’ का तर्क नहीं दे सकता है। (Bengal Politics) यदि किसी भी राजनीतिक या विधायी दल में दो फाड़ होते हैं और दोनों गुट एक-दूसरे के विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए विधानसभा अध्यक्ष के सामने याचिका दायर करते हैं, तो कोई भी गुट शुरुआत में कानूनी रूप से यह दावा नहीं कर सकता कि वही मूल या असली पार्टी है।
असली पार्टी का फैसला सिर्फ नंबर गेम नहीं
महाराष्ट्र के प्रसिद्ध शिवसेना मामले की सुनवाई करते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने यह पूरी तरह साफ कर दिया था कि जब भी किसी राजनीतिक दल के भीतर दो या दो से अधिक विरोधी गुट बन जाते हैं, तो विधायकों की अयोग्यता की याचिकाओं पर फैसला सुनाते समय विधानसभा अध्यक्ष को ही यह तय करना होगा कि वास्तव में असली राजनीतिक दल कौन सा है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, इसके लिए अध्यक्ष को बेहद कड़े और निष्पक्ष मानकों का पालन करना होगा।
EC में दर्ज पार्टी का संविधान ही माना जाएगा सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, विधानसभा अध्यक्ष को फैसला लेते समय संबंधित पार्टी के मूल संविधान के साथ-साथ उन सभी नियमों और विनियमों पर गहराई से विचार करना होगा जो पार्टी के नेतृत्व के ढांचे को तय करते हैं। (Bengal Politics) यदि दोनों ही विरोधी गुट अध्यक्ष के सामने पार्टी के संविधान की दो अलग-अलग कॉपियां या संस्करण पेश करते हैं, तो अध्यक्ष को केवल उसी संस्करण को कानूनी रूप से सही मानना होगा जो विवाद शुरू होने से ठीक पहले देश के चुनाव आयोग (ईसी) के पास आधिकारिक तौर पर जमा किया गया था। यानी वह संविधान, जिस पर विवाद से पहले दोनों गुटों की पूरी सहमति थी। इससे यह फायदा होता है कि कोई भी बागी या मुख्य गुट अपने निजी फायदे के लिए बाद में पार्टी के संविधान में कोई मनमाना बदलाव न कर सके।
केवल विधायकों की संख्या देखकर फैसला लेने पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में साफ तौर पर कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष अपना अंतिम फैसला केवल इस अंधे मूल्यांकन के आधार पर नहीं ले सकते कि सदन के भीतर किस गुट के पास ज्यादा विधायकों का समर्थन है। (Bengal Politics) सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह मामला केवल नंबरों का खेल नहीं है, बल्कि इससे कहीं ज्यादा बड़ा है। विधानसभा के बाहर यानी मूल संगठन में पार्टी के नेतृत्व का ढांचा कैसा है और आम जनता के बीच उसकी क्या स्थिति है, इस बड़े मुद्दे को तय करने के लिए वह एक अत्यंत जरूरी और प्रासंगिक विचार है।
TMC के सामने अब आगे की क्या है कानूनी राह
इस कानूनी स्थिति को देखा जाए तो यदि टीएमसी का बागी गुट केवल अपने पाले में खड़े विधायकों की बड़ी संख्या के बल पर खुद को असली तृणमूल कांग्रेस साबित करने की कोशिश करता है, तो पश्चिम बंगाल के विधानसभा अध्यक्ष उसे सीधे तौर पर मान्यता नहीं दे सकते हैं। (Bengal Politics) स्पीकर को विधायकों की कुल संख्या देखने के अलावा, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज टीएमसी के मूल सांगठनिक ढांचे और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मुख्य पार्टी की वास्तविक स्थिति को भी कानून के तराजू पर पूरी तरह तौलना होगा, तभी कोई अंतिम फैसला संभव हो पाएगा।















