TMC Crisis: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों सियासी घमासान देखने को मिल रहा है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ती असंतुष्टि और लगातार सामने आ रहे विवादों ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा दो विधायकों को पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद अब यह अटकलें तेज हो गई हैं कि पार्टी के कई विधायक अलग राह पकड़ सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़े स्तर पर टूट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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TMC Crisis: कई पार्षदों, स्थानीय नेताओं की पार्टी गतिविधियों से दूरी
रिपोर्टों के अनुसार, हाल के दिनों में कई पार्षदों और स्थानीय नेताओं ने पार्टी गतिविधियों से दूरी बनाई है। वहीं, कुछ वरिष्ठ नेताओं की पार्टी कार्यक्रमों में अनुपस्थिति भी सवाल खड़े कर रही है। ऐसे माहौल में दो विधायकों के निष्कासन ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। बताया जा रहा है कि निष्कासन के बाद विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के विधायकों की संख्या घटकर 78 रह गई है। (TMC Crisis) राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि निष्कासित विधायक रीताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के नेतृत्व में नई तृणमूल कांग्रेस का गठन हो सकता है। हालांकि, दोनों नेताओं या उनके समर्थकों की ओर से इस संबंध में कोई सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है।
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तृणमूल कांग्रेस द्वारा जारी निष्कासन पत्र में कहा गया कि दोनों विधायक पार्टी नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों में लगातार अनुपस्थित रहे और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल पाए गए। पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि उन्होंने ऐसे बयान दिए जो पार्टी के हितों के खिलाफ थे। (TMC Crisis) पार्टी उपाध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य के हस्ताक्षर वाले पत्र में कहा गया कि सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद सक्षम प्राधिकारी ने दोनों नेताओं की प्राथमिक सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का निर्णय लिया।
पश्चिम बंगाल में महाराष्ट्र जैसी स्थिति!
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में विधायक अलग होकर नया गुट बनाते हैं, तो पश्चिम बंगाल में महाराष्ट्र जैसी राजनीतिक स्थिति देखने को मिल सकती है। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर हुए विभाजन ने राज्य की राजनीति की दिशा बदल दी थी। (TMC Crisis) शिवसेना में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विद्रोह के बाद पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह तक बदल गया था। इसी तरह शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी दो गुटों में बंट गई थी। ऐसे उदाहरणों के चलते बंगाल की राजनीतिक स्थिति पर भी सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
इस पूरे विवाद को नया मोड़ तब मिला जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी इन दोनों विधायकों का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि इन्हीं विधायकों की शिकायत के आधार पर विधानसभा सचिवालय ने कथित फर्जी हस्ताक्षरों के मामले में कार्रवाई शुरू की थी। (TMC Crisis) शिकायत में आरोप लगाया गया था कि विपक्ष के नेता के चयन से जुड़े समर्थन पत्र में कई हस्ताक्षर संदिग्ध थे और पार्टी बैठक में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया था। फिलहाल तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व स्थिति को नियंत्रित करने में जुटा हुआ है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में बड़े घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।















