Journalist : बिहार की राजनीति का “पलटू राम” बनना नीतीश कुमार की मज़बूरी या पसंद ?

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Journalist : राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता. अगर किसी व्यक्ति ने इसे गहराई से आत्मसात किया है तो वह नीतीश कुमार हैं। बार-बार पाला बदलने के लिए ‘पलटू राम’ कहे जाने वाले जदयू नेता ने एक बार फिर ऐसा किया है।रविवार को, नीतीश कुमार ने बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और वामपंथी दलों के महागठबंधन को छोड़कर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में फिर से शामिल हो गए। नीतीश ने भाजपा के समर्थन से अपनी सरकार बदलने का दावा पेश किया ।नीतीश कुमार की जेडीयू ने पिछला विधानसभा चुनाव 2020 में बीजेपी के साथ लड़ा था, लेकिन अगस्त 2022 में उससे अलग हो गई। अब, 1.5 साल में, उन्होंने फिर से पाला बदल लिया है और अपने पुराने सहयोगी बीजेपी के पास लौट आए हैं। बिहार की राजनीति में हर साल डेढ़ साल में सरकार बदल जाती है लेकिन सीएम नीतीश कुमार होते हैं। रविवार को नीतीश कुमार ने नौंवी बार राज्य के सीएम पद की शपथ ली। इसबार उन्होंने आरजेडी को झटका दिया। इस बार पाला बदलते हुए नीतीश ने कहा कि गठबंधन से मुक्ति मिल गई है और इस बार इधर-उधर जाने का सवाल नहीं है। बिहार में जो कुछ तीन दिन में हुआ इसकी उम्मीद नहीं की जा रही थी। क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब भाजपा का साथ छोड़ा तो सार्वजनिक तौर पर कहा था कि वो मर जाएंगे लेकिन भाजपा में नहीं जाएंगे और ना ही कभी भाजपा का समर्थन लेंगे। लेकिन अब राजनीति में वादों, कसमों का दौर चला गया। अब तो जो मिला उसी के साथ अपने निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए साथ चले जाते हैं। इस बदलती तस्वीर में अगर कोई सबसे ज्यादा अपमान महसूस करता है तो वो मतदाता ही करता है। यदि कमल के फूल पर वोट देकर किसी कोई सदन में भेजता है, अपना प्रतिनिधित्व सौंपता है या हाथ पर वोट देकर अपना प्रतिनिधित्व सौंपता है और कुछ समय बाद कोई कमल वाला हाथ और हाथ वाला कमल थाम लेता है, वो मतदाता की परवाह नहीं करता, मतदाताओं की भावनाओं की इज्जत नहीं करता। इसलिए मुझे लगता है कि सबसे ज्यादा अपमान ये नेता लोग अपने निजी स्वार्थ के कारण मतदाताओं से करते हैं। यही हाल बिहार में हुआ।

Journalist : बिहार की राजनीति का "पलटू राम" बनना नीतीश कुमार की मज़बूरी या पसंद ?
Journalist : बिहार की राजनीति का “पलटू राम” बनना नीतीश कुमार की मज़बूरी या पसंद ?

Journalist : ये नीतीश की मजबूरियां और पसंद दोनों हैं.


पहले बात मजबूरियों की. नीतीश कुमार अद्वितीय हैं क्योंकि 243 सदस्यीय सदन में उनके 43 विधायक हैं और फिर भी वे मुख्यमंत्री हैं।जेडीयू के छोटे खिलाड़ी होने के अलावा, नीतीश भी कुर्मी हैं, एक ऐसी जाति जो बिहार की आबादी का सिर्फ 2.87% है। इसकी तुलना लालू यादव और तेजस्वी की राजद के मूल वोट आधार 14.26% यादवों से करें और आपको नीतीश के नुकसान का एहसास होगा। लेकिन नीतीश कुमार उससे कैसे उबरते हैं? यादव और कुर्मी दोनों अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का हिस्सा हैं।हालाँकि, समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर के अनुयायी, एक मास्टर सोशल इंजीनियर भी हैं। नीतीश अत्यंत पिछड़े वर्ग (ईबीसी) के नेता के रूप में उभरे, जो बिहार की आबादी का 30% से अधिक है। तो, अब, वह न केवल कुर्मियों, बल्कि संपूर्ण ईबीसी के नेता हैं। बिहार जाति जनगणना का उद्देश्य उनके ईबीसी नेतृत्व को मजबूत करना था । इन सबके साथ, अगर बिहार की जाति-प्रधान राजनीति में एक चीज स्थिर है, तो वह यह है कि नीतीश मुख्यमंत्री हैं। गणित या केमिस्ट्री जो भी हो, वह 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री हैं। और मुख्यमंत्री बनना उनकी मजबूरी भी है.राजद के 79 विधायकों और भाजपा के 78 विधायकों के बाद जदयू 43 विधायकों के साथ बिहार में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है।अगर नीतीश मुख्यमंत्री नहीं रहे तो उनके लिए अपने दल को एकजुट रखना बहुत मुश्किल हो सकता है. यह एक बड़ी मजबूरी है.हाल ही में, राजद पर जद (यू) में विभाजन की कोशिश करने का आरोप लगाया गया है। नीतीश को योजना की भनक लग गई और दिसंबर में राजीव रंजन सिंह उर्फ ​​ललन सिंह को जदयू अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। ललन सिंह राजद के यादवों के बहुत करीब हो गए थे और बताया जाता है कि उन्होंने नीतीश को तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद देने के लिए मनाने की भी कोशिश की थी। नीतीश एक मुखर राजद के साथ असहज थे, जैसा कि वह 2017 में थे। यह महसूस करते हुए कि उनके पास पैंतरेबाज़ी करने के लिए बहुत कम जगह है, नीतीश ने राजद के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने के दो साल बाद 2017 में महागठबंधन छोड़ दिया ।

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इस बार नीतीश कुमार के पाला बदलने के तीन मुख्य कारण थे।”नीतीश कुमार ने जिस भारतीय गुट को साथ लिया था, वह अब बिखर गया है। और उनके पास वहां कोई गुंजाइश नहीं है। दूसरे, राजद और जदयू के आंतरिक सर्वेक्षण से पता चला है कि वे एक साथ अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं।” .”तीसरी मजबूरी नीतीश की पार्टी के भीतर से थी। जो लोग लोकसभा चुनाव जीते, वे भाजपा के साथ जद (यू) के सामाजिक संयोजन के कारण जीते। वे सहज महसूस नहीं कर रहे हैं, उनके सलाहकार सहज महसूस नहीं कर रहे हैं। उनका मानना ​​है कि जीत संभव है भाजपा के साथ बेहतर है, हर चीज़ मजबूरी नहीं होती, इसमें से बहुत कुछ पसंद का भी होता है।

नीतीश कुमार ने एक बार फिर बिहार की राजनीति का रीसेट बटन दबा दिया है। अब बड़ा सवाल उठता है कि आखिर राजनीति के मौसम वैज्ञानिक ने बीजेपी के साथ जाने का फैसला क्यों किया? और कैसे नीतीश के कारण राज्य के तीन मुख्य राजनीतिक किरदारों के समीकरण बदल जाएंगे? नीतीश कुमार करीब दो दशक से बिहार के सीएम बने हुए हैं। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने विकास पुरुष की छवि बनाई थी और हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के साथ चले थे। 2014 में नरेंद्र मोदी के उत्थान के बाद उन्होंने अपना रास्ता बदलना शुरू किया। कोई भी अकेली पार्टी बिना नीतीश के बहुमत के करीब नहीं पहुंच सकती थी। यही एक ऐसी बात थी जिसके बाद वो एक दशक से कम वक्त में अबतक चार बार पाला बदल चुके हैं।लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद नीतीश अपने रास्ते से भटक गए और बीजेपी तथा आरजेडी के साथ समझौता कर सरकार बनाते गए। इससे उनकी छवि को धक्का भी लगा। 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू, आरजेडी और बीजेपी के बाद तीसरे नंबर पर रही थी। एक सर्वे के अनुसार, 2010 में करीब 60 फीसदी लोगों ने नीतीश कुमार को एक और कार्यकाल देने की वकालत की थी लेकिन जबकि 2020 में ये घटकर महज 36 फीसदी रह गया था। यही नहीं, सबसे ज्यादा मुश्किल चीज तो ये थी कि वे लोगों के सीएम के सबसे पसंदीदा चेहरा नहीं थे बल्कि उनके सामने तेजस्वी यादव खड़े हो गए थे।

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इसके अलावा नीतीश को सवर्णों और अल्पसंख्यकों के समर्थन का भी नुकसान हुआ था। लेकिन नीतीश स्विगं वोटरों के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहे। इन वोटर्स में ईबीसी (गैर यादव ओबीसी), कुर्मी, कुशवाहा और गैर पासवान दलित वोट शामिल थे।JDU ने RJD के साथ मिलकर थोड़े समय के लिए जो सरकार बनाई थी, उससे हम क्या सीख सकते हैं? अगर सबकुछ ठीक चलता तो ये कोशिश थी एक ऐसा बीच का रास्ता बनाने की कोशिश की जाए जो लोगों को भरोसा दे सके। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि बिहार में हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के बीच तेजी से बन रहा दो ध्रुवीय राजनीतिक माहौल JDU के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका था। आसान शब्दों में कहें तो JDU ऐसा बीच का रास्ता ढूंढने की कोशिश कर रहा है जो किसी को नाराज न करे और दोनों तरफ के लोगों को आकर्षित करे। लेकिन बिहार में राजनीति बहुत तेजी से दो गुटों में बंट रही है, एक तरफ हिंदुत्व समर्थक और दूसरी तरफ सामाजिक न्याय के पक्षधर। अगर JDU इस माहौल में अपना वजूद बनाए रखना चाहती है तो उसे कुछ नया करना होगा।RJD ने JDU के साथ सरकार बनाई तो JDU को नुकसान भी हुआ। क्योंकि RJD मुसलमानों और यादवों के सहारे अपने सामाजिक न्याय के वादे से JDU के वोट खींच सकता था। हालांकि RJD को JDU के मुकाबले तीन बड़े फायदे थे। पहला, मुसलमान और यादव, यानी बिहार की एक तिहाई आबादी, सीधे RJD को वोट देती है। दूसरा, RJD की विचारधारा सामाजिक न्याय पर टिकी है, वहीं JDU सोशल इंजीनियरिंग की बात करती है। तीसरा, तेजस्वी जैसा युवा नेता RJD को आगे ले जा सकते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि 2015 में आरजेडी JDU से वोट प्रतिशत के मामले में 2% आगे था, और 2020 में ये अंतर बढ़कर 8% हो गया था।जेडीयू अब ये दावा कर सकती है कि उसने आरजेडी के साथ गठबंधन में रहते हुए कई अहम उपलब्धियां हासिल कीं। खासकर जाति जनगणना और आरक्षण का कोटा बढ़ाना। इसके जरिए जेडीयू ने ईबीसी और दलितों में अपनी पकड़ को और मजबूत करने का काम किया। इसके अलावा नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ईबीसी नेता कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के बाद नीतीश ने पाला बदलने का पूरा प्लान एक्टिव कर दिया। इसके बदले में जेडीयू को राम मंदिर बनने के बाद बीजेपी के पक्ष में बनी हवा का फायदा तो मिलेगा ही साथ ही साथ वह अपनी लोकसभा सीटें बचाने में भी कामयाब हो सकते हैं।

Journalist : नीतीश का सपना टूट गया


इस पलटी के बाद ऐसा लगता है कि नीतीश ने आखिरकार प्रधानमंत्री बनने का सपना छोड़ दिया है। वो सोचते थे कि विपक्षी गठबंधन में संयोजक बनकर और त्रिशंकु संसद वाली स्थिति में वे अपनी अच्छी छवि का फायदा उठाकर पीएम बन सकते थे। हालांकि, इस बात की संभावना पहले से ही कम थी। असल में जेडीयू को नुकसान होने का खतरा ज्यादा था। अगर नीतीश कुमार के कमजोर दिखने से जेडीयू को नुकसान होता। नीतीश के कमजोर होने से पार्टी के अस्तित्व पर सवाल उठते। इसके अलावा लोकसभा चुनाव बाद बीजेपी और आरजेडी दोनों से मोलभाव करने की उनकी ताकत कम हो सकती थी। इसलिए वो एकसाथ चुनाव कराने की जिद कर रहे थे।बीजेपी के लिए बिहार सबसे फायदे का सौदा है। ये एक ऐसा राज्य था जहां एनडीए को लोकसभा चुनाव में बड़ा नुकसान उठाने की उम्मीद थी। एक साल पहले, पटना में विपक्षी पार्टियों की बैठक में कहा गया था कि वे ‘देश को रास्ता दिखाएंगे’। लेकिन अब, पहली बात- नीतीश के वापस आने से बिहार में एनडीए के पक्ष में हवा बदल गई है। दूसरी बात, जिस नेता ने एनडीए से खुद को अलग किया था, उसने ही कांग्रेस की न्याय यात्रा के पंख काट दिए हैं।

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बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल ये है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व के कारण पार्टी का बिहार में भगवा दल का कोई बड़ा नेता नहीं बन पाया। 20 साल से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन पार्टी अपनी खुद की पहचान नहीं बना पा रही है और हर चीज में नीतीश कुमार पर निर्भर है। 2014 के लोकसभा चुनाव में, जब जेडीयू और बीजेपी अलग-अलग लड़े थे, तो बीजेपी को ज्यादा ओबीसी और दलित वोट मिले थे। 2015 और 2022 में जेडीयू का आरजेडी के साथ गठबंधन का मुख्य कारण भी यह था कि अपने मुख्य वोटरों को बीजेपी के हिंदू राष्ट्रवाद और मोदी के नेतृत्व से बचाया जा सके।जेडीयू के छिटकने के बाद आर आरजेडी के लिए मुश्किल बढ़ गई है। पार्टी अब चुनाव में जाति जनगणना के बाद ‘फॉरवर्ड बनाम बैकवर्ड’ की लड़ाई वाली रणनीति से आगे नहीं बढ़ पाएगी, जैसाकि उसने 2015 के विधानसभा चुनाव में किया था। जेडीयू गैर यादव ओबीसी वोटर्स के लिए सोशल इंजीनियरिंग के जरिए आगे बढ़ती है। ये वोटर्स राज्य में कथित ‘यादव प्रभुत्व’ और ‘जंगल राज’ के लौटने के खौफ के कारण महागठबंधन से छिटकी रहती है। हालांकि, आरजेडी के लिए अभी भी मौका है। वह अब 2025 विधानसभा चुनाव के लिए एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सकती है और सरकार विरोधी लहर का फायदा उठा सकती है। यही नहीं, विपक्ष में रहकर आरजेडी अपने कार्यकर्ताओं को तैयार कर सकती है। तेजस्वी यादव ने महागठबंदन की सरकार में अच्छा काम करके लोगों का भरोसा जीता होगा। लेकिन पूरे देश के चुनावों की बात करें तो, बिहार में एनडीए का गढ़ इतना मजबूत है कि आरजेडी-कांग्रेस का पार पाना मुश्किल लगता है। अब नाटकीय उलटफेर के बाद नीतीश कुमार ने रविवार को रिकॉर्ड नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, उन्होंने महागठबंधन और विपक्षी गुट इंडिया को छोड़ दिया और भाजपा के साथ एक नई सरकार बनाई, जिसे उन्होंने 18 महीने से भी कम समय पहले छोड़ दिया था।

प्रतीक्षा वर्मा

https://youtu.be/BzN2jM9DGHI?si=4AFFZWraYcdI5fWV

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