Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर मौजूदा वक़्त में धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में बड़ा विवाद छिड़ा हुआ है। इस बार मामला तब गरमा गया जब शंकराचार्य अभिमुक्तेश्वरानंद जी महाराज ने सार्वजनिक रूप से योगी आदित्यनाथ को ‘असली हिंदू साबित करने’ की चुनौती दे डाली।
उन्होंने कहा कि योगी आदित्यनाथ को 40 दिनों के अंदर यह सिद्ध करना होगा कि वह ‘असली हिंदू’ हैं, नहीं तो 11 मार्च को लखनऊ आकर उन्हें ‘नकली हिंदू’ घोषित किया जाएगा। (Uttar Pradesh News) इस बयान के सामने आते ही पूरे देश में तगड़ी बहस तेज हो गई है कि क्या किसी धर्माचार्य को यह अधिकार है कि वह किसी व्यक्ति को हिंदू या गैर-हिंदू घोषित कर सके?
Uttar Pradesh News: हिंदू धर्म में ‘खारिज करने’ की व्यवस्था पर सवाल
विशेषज्ञों और संत समाज के कई वर्गों का कहना है कि हिंदू धर्म में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जहां किसी व्यक्ति को धर्म से बाहर निकालने का अधिकार किसी एक संस्था या व्यक्ति को हो। (Uttar Pradesh News) हिंदू धर्म की परंपरा में “किसी को हिंदू घोषित करने या नकारने” जैसी कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। यही वजह है कि शंकराचार्य की यह चुनौती अपने आप में एक असाधारण ही मानी जा रही है।
योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्व छवि पर सवाल क्यों?
योगी आदित्यनाथ देश की राजनीति में ऐसे नेता के रूप में पहचाने जाते हैं जिनकी पहचान हमेशा से कट्टर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद से जुड़ी रही है। यहां तक कि उनके राजनीतिक विरोधी भी हमेशा से उन पर यही आरोप लगाते रहे हैं कि वह हिंदुत्व की राजनीति के सबसे बड़े चेहरों में से एक हैं। (Uttar Pradesh News) ऐसे में अब शंकराचार्य द्वारा योगी को ‘नकली हिंदू’ कहने की चेतावनी ने सबको चौंका दिया है।
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पहले भी विवादों में रहे हैं शंकराचार्य
यह पहली बार नहीं है जब अभिमुक्तेश्वरानंद जी महाराज ने किसी बड़े राजनीतिक नेता को हिंदू धर्म से ‘खारिज’ करने जैसा बयान दिया हो।
- अखिलेश यादव सरकार के दौरान उन्होंने दावा किया था कि संतों पर लाठीचार्ज करवाने वाला व्यक्ति हिंदू नहीं हो सकता।
- इससे पहले राहुल गांधी को लेकर भी उन्होंने कहा था कि उन्होंने उन्हें हिंदू धर्म से खारिज कर दिया है।
इन बयानों के कारण पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समर्थकों ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी।
योगी समर्थकों का संयम चर्चा में
इस पूरे विवाद में एक सबसे महत्वपूर्ण और बड़ी बात यह भी सामने आई है कि योगी आदित्यनाथ या भारतीय जनता पार्टी की तरफ से शंकराचार्य पर कोई तीखी टिप्पणी नहीं की गई। (Uttar Pradesh News) इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संयम इसलिए बरता गया क्योंकि शंकराचार्य एक प्राचीन धार्मिक पीठ के प्रतिनिधि हैं और उस पद की गरिमा का सम्मान किया जा रहा है।
राजनीति में धर्माचार्यों की भूमिका पर बहस
इस विवाद ने एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या धर्माचार्यों को राजनीति में इस तरह हस्तक्षेप करना चाहिए? कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि शंकराचार्य जैसे पदों को ‘सर्वसमाज’ का माना जाता है। ऐसे में किसी एक नेता के खिलाफ इस तरह की चुनौती देना धार्मिक गरिमा को प्रभावित कर सकता है।
योगी आदित्यनाथ और गोरक्षपीठ का ऐतिहासिक योगदान
योगी आदित्यनाथ नाथ पंथ के सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी माने जाते हैं। (Uttar Pradesh News) गोरक्षपीठ का अयोध्या राम मंदिर आंदोलन में ऐतिहासिक योगदान रहा है। ऐसे में उनके हिंदुत्व पर सवाल खड़े करना कई लोगों को असंगत लग रहा है।
क्या आगे बढ़ेगा विवाद?
अब सबकी निगाहें 11 मार्च पर टिकी हुई हैं, जब शंकराचार्य ने लखनऊ में घोषणा करने की बात कही है। (Uttar Pradesh News) इसे लेकर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद आगामी वक़्त में उत्तर प्रदेश की राजनीति और धर्म के संबंधों पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। फिलहाल, इतना तय है कि योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्व पहचान पर सवाल खड़े कर के शंकराचार्य ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जो आगामी दिनों में और तेज हो सकती है।
बता दे, यह मामला सिर्फ योगी आदित्यनाथ की धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंदू धर्म की परंपरा, धर्माचार्यों की भूमिका और राजनीति में धार्मिक हस्तक्षेप जैसे बड़े मुद्दों से जुड़ गया है। आगामी कुछ दिनों में यह विवाद किस दिशा में जाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा।














